Tuesday, April 26, 2011

लोक पाल बिल

लोक पाल के बनने से ऐसा हजूर डर क्या है
काले धन को खोने का ऐसा हजूर डर क्या हैं
जेल वेल की नौबत ही कब आ पायेगी इस से
बनने कब दोगे तुम इस को फिर हजूर डर क्या है ||

रिश्वत खोरी घोटालों से हडपी जो माया है
देने की बारी आएगी तुम ने जो पाया है
हाथी के आने पर कुत्ते शोर बहुत करते हैं
इसी तरह गद्दार देश के भी भौं २ करते हैं ||

कथनी करनी में अब कितना अंतर देख रहे हो
दिखने में ईमान दार हो सब कुछ देख रहे हो
इसी लिए क्या तुम चरणों के इतने दास बने हो
पकड़े रखो चरण इन्ही से ओहदे पर पंहुचे हो ||

जिस की थाली में खायाहै उस में छेद किया है
जिस का साथ दिया उस का ही बंटा ढार किया है
बिना बात के पांव फटे में देने में माहिर हो
षड्यंत्रों में फंसा किसी को भी बदनाम किया है ||

पहले तो नेता जी के ये आगे खोल खड़े थे
उस के बाद बड़े भईयाके पीछे खूब पड़े थे
दो भाइयों के बीच मुकदमे बाजी भी करवाई
अब न लोक पाल बन जाये यह सुपारी पाई ||

5 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सटीक चित्रण कर दिया है ...अच्छी प्रस्तुति

udaya veer singh said...

sarthak kathya , abhar ji .

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (28-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

दिगम्बर नासवा said...

जिस की थाली में खायाहै उस में छेद किया है
जिस का साथ दिया उस का ही बंटा ढार किया है ...

Abhi tak to ye desh ke netaaon ka charitr hai ... kaheen desh ke har naagrik ka charitr hi aisa n ho jaaye ...

प्रवीण पाण्डेय said...

कारण बताना चाहिये कि यह विधेयक क्यों न बने।