Monday, April 18, 2011

गीत मत गाओ

गीत मत गाओ सभी कुछ ठहर जाता है
गीत मत गाओ ये दरिया बहक जाता है
गीत को सुन कर परिंदा लौट आता है
गीत को सुन कर उड़ाने भूल जाता है
रोकना चाहो समय को तुम सुरीली तन से
पर समय तो और भी कुछ दूर जाता है
दर्द में भीगे हुए फाहे रखो मत घाव पर
घाव इस से और ज्यादा गहर जाता है
ये सुरीली तन तो नश्तर चुभोती है
तन मत छेड़ो वो उड़ना भूल जाता है
जब नदी ही ठहर जाती है रवानी छोड़ कर
फिर उसे बादल संदेशा आ सुनाता है ||

5 comments:

वन्दना said...

बहुत सुन्दर भाव्।

pgmith said...

hi sir aap bhot acha likhta h.mujha to bhot acha laaga apka geet mat gao.

अनामिका की सदायें ...... said...

bahut sunder abhivyakti.

tan ki jagah taan kar le to rachna ki sunderta aur badh jayegi.

सतीश सक्सेना said...

प्यारे भाव हैं शुभकामनायें आपको !
तन( तान ) को ठीक करियेगा !

प्रवीण पाण्डेय said...

गीत मत गाओ,
सब सुनते हैं।