Wednesday, May 18, 2011

ग्रीष्म ऋतू की त्रिपदी

त्रि-पदी हिंदी के लिए नया छंद है मैंने नेट पर पहले सर्दी कि त्रिप्दियाँ प्रकाशित कि थीं जिन का मित्रों ने भरपूर स्वागत किया था व आशीर्वाद दिया था इसी कड़ी में ग्रीष्म ऋतू पर कुछ त्रिपदी प्रस्तुत है

ग्रीष्म ऋतू की त्रिपदी

क्यों इतना जलते हो
थोडा तो जरा ठहरो
क्यों राख बनाते हो

ये आग ही तो मैं हूँ
यदि आग नही होगी
तो राख ही तो मैं हूँ

अपनों ने ही सुलगाया
क्या खूब तमाशा है
नजदीक में जो आया

दिल में क्यों लगाई है
ये और सुलगती है
ऐसी क्यों लगाई है

ज्वाला भड़कती है
आँखों की चिंगारी
दिल खूब जलती है

ये सर्द बना देगी
इस आग को मत छूना
तिल तिल सा जला देगी

क्या क्या न जलाएगी
इस आग को मत छेड़ो
ये मन को बुझाएगी

इस आग को मत छेड़ो
यह दिल में सुलगती है
इस को मत छेड़ो

अंगार तो बुझता है
कितना भी जला लो तुम
वह दिल सा बुझता है

हर आँख में होती है
ये आग तो ऐसी है
ये सब में होती है

जलना ही मिला मुझ को
मैं तो अंगारा हूँ
कब चैन मिला मुझ को

जल २ के बुझा हूँ मैं
बस आग को पिया है
उसे पिता रहा हूँ मैं

मुझे यूं ही सुलगने दो
मत तेज हवा देना
कुछ तो जी लेने दो

सब आग से जलते हैं
कुछ को वो जलती है
कुछ खुद को जलते है

क्यों आग से घबराना
जब जलना ही था तो
क्यों उस को नही जाना

हाँ आग बरसती है
यह जेठ दुपहरी ही
सब आग उगलती है

क्यों दिल को जलते हो
ये इकला नही जलता
क्यों खुद को जलते हो

मरना भी अच्छा है
तब ही तो जलता हैं
जलना भी अच्छा है

धुंआ भी उठने दो
अंगार बनेगा ही
धीरे से सुलगने दो

यह आग न खो जाये
दिल में ही इसे रखना
यह रख न हो जाये

यह आग है खेल नही
दिल जैसी सुलगती है
इसे सहना खेल नही

4 comments:

वन्दना said...

बहुत सुन्दर त्रिपदी।

कविता रावत said...

ग्रीष्म ऋतू पर bahut hi sundar saarthak tripadi....

राजेश उत्‍साही said...

जैसा कि मैंने अपनी पिछली टिप्‍पणी में कहा कि एक बार में चार से ज्‍यादा रचनाएं नहीं दें। यहां भी वही बात दोहरा रहा हूं। क्षणिकाएं हों,मुक्‍तक हों,हाइकू हों या फिर लघुकथा हो या गजल के शेर या दोहे हों सभी अपनी लघुता में बहुत गहरी बात और दर्शन समाए रहते हैं। यही इनकी ताकत है। यहां आपने जलन,जलने और ग्रीष्‍म को अलग अलग ढ़ंग से कहने की कोशिश की है। पर आप उसे जितने अलग ढ़ंग से कहने की कोशिश करेंगे, वह अपना महत्‍व खोते जाएंगे। इसलिए मेरी राय है कि संख्‍या की बजाय गुणवत्‍ता पर जोर देने का प्रयत्‍न करें।
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यहां जो त्रिपदियां हैं उनमें संभवत: इनपुटिंग की अशुद्धियां हैं। उन्‍हें अगर ठीक कर लेंगे तो वे और अर्थवान हो जाएंगी।

प्रवीण पाण्डेय said...

धीरे धीरे यह विधा भा रही है। बहुत ही प्रवाहमय प्रस्तुति।