Tuesday, May 3, 2011

नया पुराना

नया पुराना


जिन्हें फिर से तोड़ेंगी
आने वाली पीढियां वे सोचते हैं
हम ने तोड़ दीं रूढ़ियाँ
और बना दिया नये नियम
उत्तम और सर्वोत्तम
परन्तु यह सोचना
बड़ी भूल है हमारी
क्यों कि
यही नियम ही तो बनेंगे
रूढ़ियाँ
और यही नियम बन जायेंगे
पुरानी परम्पराएं
पुरानी और दकियानूसी कह कर ||

5 comments:

सतीश सक्सेना said...

समय के साथ परम्पराएँ , रूढ़ियों में बदलती जायेंगी ! यही नियम है प्रकृति का ! शुभकामनायें आपको !

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (5-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

anupama's sukrity ! said...

१०० फीसदी सच ...
गोल गोल घूमती है चीज़ें ....समय का चक्र ....नया फिर पुराना बनता है ......और वही पुराना रूप बदल कर नया बनता है ....!!!
बहुत अच्छा लिखा है ...बधाई

प्रवीण पाण्डेय said...

नियमों का निर्माण, प्रथाओं का अन्त चलता रहता है बस आधार में आनन्द हो।

अनामिका की सदायें ...... said...

aaj ka vartmaan kal itihaas hi banNa hai.
yahi niyam hai.