Tuesday, May 10, 2011

कुछ नही बदलता है

पतझड़ ,वसंत ,
सर्दी गर्मी व बरसात
सभी कुछ आता है
हर बार अपनी ही तरह
परन्तु हम ही उसे
करते हैं कम या अधिक
अपने २ मन की
तराजू पर तोल २ कर
कभी कोयल की कूक को सुंदर बता कर
कभी बसंत के पीले रंग को
अपने दुःख से मिला कर
परन्तु न तो मौसम बदलता है
अपना रंग ,अपना मिजाज
और न ही अपना क्रम
अपितु हम ही बदल जाते हैं
और रंगते रहते हैं
अपने ही रंगों में
फूलों को ,भंवरों को ,तितलियों को
बादलों को ,शीत को और ताप को

8 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

अपने मन के रंगों में हम नित नित नया रंगाते हैं,
जो चाहें, न बन पायें वो, जो न चाहें, बन जाते हैं।

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (12-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

उत्साही जी द्वारा आपके काव्य-संग्रह पर की गई समीक्षा पढ कर आपका ब्लाग देखने की भी लालसा हुई । गुप्त जी ने भी यही तो संकेत दिया है--
सरल-तरल जिन तुहिन कणों से हँसती हर्षित होती है । अति आत्मीया प्रकृति हमारे साथ उन्ही से रोती है ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

परन्तु न तो मौसम बदलता है
अपना रंग ,अपना मिजाज
और न ही अपना क्रम
अपितु हम ही बदल जाते हैं

जैसा जिसका मन होता है वैसा ही मौसम दिखता है

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

'अपितु हम ही बदल जाते हैं '

...............गहन भावों की सुन्दर रचना

S.M.HABIB said...

बहुत सुन्दर, गहरी भावाभिव्यक्ति.....
सादर....

दिगम्बर नासवा said...

अलग सा ख्याल है इस रचना में .. हम ही बदल जाते हैं ...

mridula pradhan said...

bahut pasand aayee.....