Monday, December 6, 2010

नव गीतिका

इस तरह तू हवा की वकालत न कर
देख , दुनिया की ऐसे अदावत न कर
आसमाँ से तेरी दोस्ती क्या हुई
सोच अपनों की ऐसे खिलाफत न कर
चाँद तारों की ऐसे खिलाफत न कर
धूप सूरज की ऐसे खिलाफत न कर
ठीक है तेरी दौलत की गिनती नही
क्या पता है समय का दिखावट न कर
हाथ में तेरे बेशक है ताकत सही
गैब से थोडा डर तू शरारत न कर
प्यार के बोल मीठे हैं अनमोल हैं
और इस के सिवा तू लिखावट न कर
जान ले तेरे प्रीतम की मूरत है क्या
छोड़ दे और चीजें इबादत न कर

5 comments:

अरुण चन्द्र रॉय said...

सुन्दर गीत..

वन्दना said...

बहुत सुन्दर्।

नरेन्द्र व्यास said...

आसमाँ से तेरी दोस्ती क्या हुई
सोच अपनों की ऐसे खिलाफत न कर
xxxxxxxx
ठीक है तेरी दौलत की गिनती नही
क्या पता है समय का दिखावट न कर
xxxxxxxx
प्यार के बोल मीठे हैं अनमोल हैं
और इस के सिवा तू लिखावट न कर
xxxxxxxx
खास कर ये पंक्तियाँ बेहद ही ख़ूबसूरत और कमाल की लगी. ये गीतिकाएं ग़ज़ल के बेहद करीब हैं.. पर ठीक है इनकी भी अपनी एक परंपरा है.. ! इतनी उम्दा गीतिकाओं के लिए आपका साधुवाद आदरजोग वेद जी ! आभारी हैं हम ! नमन !

ललित शर्मा said...


बेहतरीन लेखन - सुंदर गीत के लिए आभार

मीरा रानी दीवानी कहाने लगी

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूब ...सुन्दर अभिव्यक्ति