Thursday, December 9, 2010

ढूढने वे बहाने लगे

ढूँढने वे बहाने लगे
उन को हम याद आने लगे ||
कोयलें कूकने क्या लगीं
आम पर बौर आने लगे ||
बात जब भी सताने लगी
वायदे याद आने लगे ||
कच्चे धागे से बंधन थे जो
वो ही दिल को सताने लगे ||
कौन सुनता हमारी यहाँ
जख्म सब ही दिखने लगे ||
बात जब जब भी उन की हुई
जख्म फिर से सताने लगे ||
मन की दूरी कहाँ कम हुई
हम बनावट बढ़ाने लगे |

3 comments:

वन्दना said...

बहुत ही सुन्दर भावमयी रचना।

परमजीत सिँह बाली said...

बहुत बढ़िया!!

सतीश सक्सेना said...

यह रचना दिल को छू गयी डॉ साहब ...हार्दिक शुभकामनायें !