Tuesday, January 18, 2011

आग को न छेड़ो

यूं साँस लम्बी ले कर इस घाव को न छेड़ो
दिल और जल रहा है इस आग को न छेड़ो
मुरझा गई है अब वो यूं ताप सहते सहते
दिल दुःख रहा है इस का इस पाँख को न छेड़ो
दर्पण की भांति टूटा ये दिल चटख चटख कर
टूटा है जिस से ये दिल उस बात को न छेड़ो
दिल में किरच चुभी है वो दर्द कर रही है
दुखता है इस से ये दिल इस कांच को न छेड़ो
ये सांस चल रही है इसे यूं ही चलने देना
यह बीच में रुके ना इस साँस को न छेड़ो
कितना घना अँधेरा कुछ भी न सूझता है
मेरे हाथ में है दीया इस हाथ को न छेड़ो
कहने को क्या कहूं मैं बाक़ी बचा ही क्या है
जाने दो रह गई जो उस बात को न छेड़ो

2 comments:

वन्दना said...

बहुत सुन्दर रचना।

shikha varshney said...

मुरझा गई है अब वो यूं ताप सहते सहते
दिल दुःख रहा है इस का इस पाँख को न छेड़ो

बहुत खूब.