Wednesday, October 6, 2010

मुक्तक

जिन्दगी छोटी बहुत लगती रही अक्सर मुझे
यह शिकायत ही हमेशा क्यों रही अक्सर मुझे
जिन्दगी छोटी कहाँ थी एक लम्बा वक्त थी
पर बहुत ही कम लगी ये जिन्दगी अक्सर मुझे

कोई आशा या निराशा ही चलती जिन्दगी
कल्पना का रथ लिए ही दौड़ती है जिन्दगी
चाल कब इस कहाँ पर ठहर जाये एक दम
यह कभी भी कब बताती है यहाँ पर जिन्दगी

जिन्दगी मेरी मुझी से जाने क्यों नाराज थी
मान जाती बात मेरी जो बहुत आसन थी
पर उसे उस के अहं ने सिर झुकाने न दिया
बात तो आसन थी पर जिन्दगी की बात थी

दूर से आवाज दी तो पास वो आई नही
जब गया नजदीक तो वो भाग कर आई नही
क्या पता किस सोच में यूं ही खड़ी है गुमसुम
जिन्दगी की ये नजाकत खुद उसे भाई नहीं

नाम कितने रख लिए तूने बता ओ जिन्दगी
रूप कितने धर लिए तूने बता ओ जिन्दगी
पर अधूरा सा रहा है जिन्दगी का कैनवस
रंग भर कर भी अधूरी क्यों रही है जिन्दगी

दूरियां मिट जाएँगी सब जिन्दगी की डोर से
नजदीकियां बन जाएँगी सब जिन्दगी की डोर से
डोर कच्ची है यदि तो बहुत पक्की जिन्दगी
जिन्दगी बंध जाएगी जब जिन्दगी की डोर से

जमाने की हवा को छूने चली है जिन्दगी
कुछ नये से बहाने गढने लगी है जिन्दगी
कुल मिला कर बस यही है जिन्दगी की दास्ताँ
और क्या इस से अधिक बाक़ी रही है जिन्दगी

जिन्दगी को देख लोगे तुम यदि नजदीक से
तब समझ आएगी तुम को जिन्दगी ये ठीक से
पर इसे तुम फैंसला मत मान लेना आखिरी
दूर रहती जिन्दगी है जिन्दगी की सीख से

जिन्दगी को छू लिया तो एक सिरहन सी हुई
आँख भर देखा तो उस में एक त्द्फं सी हुई
बस इसी के सहारे ये जिन्दगी चलती रही
और एक पल में इसी से जन्दगी पूरी हुई

एक दिल के लिए कितने दूसरे दिल तोडती
एक दिल के लिए अपने सिर से पत्थर तोडती
पर यदि टूटे यही दिल सोच कर देखो जरा
छोडती फिर जिन्दगी क्या सारे नाते तोडती

1 comment:

नरेन्द्र व्यास said...

aadarniya ved ji ! bahut hee sundar muktak lage..ek-ek muktak dil tak utar gaya.. har jindagi se shikayat shayad hume bhee rahee hai...isliye bahut hee kareeb lage sabhi bhav..! sampoorn evam mukammal rachna ke liye aabhar ! pranaam !