Monday, November 22, 2010

दिल्ली ....नही ,,,,मुन्नी ...दिल्ली बदनाम हुई

पहले बदनाम दिल्ली बदनाम हुई परन्तु लोगों नेशोर मचा दिया कि दिल्ली को ऐसे बदनाम नही होने देंगे क्योंकि उन्हें दिल्ली की बदनामी मंजूर नही थी |उन्हें यह अच्छा नही लगा कि दिल्ली बदनाम हो |इस लिए दिल्ली को बदनामी से बचाने के लिए बदनाम हो गई मुन्नी |मुन्नी ने दिल्ली की बदनामी अपने सिर पर ले ली |फिर क्या था मुन्नी की बदनामी जो मशहूर हुई बस पूछो मत देश का हर प्रान्त जिला नगर और गली मोहल्ले तक मुन्नी की बदनामी की धूम मच गई |
कहीं भी कोई छोटा मोटा सा कार्यक्रम भी आयोजित हो और भला मुन्नी की बदनामी न हो यह कैसे हो सकता है जैसे मन्त्रों के बिना हवन नही हो सकता ,दीपक के बिना आरती नही हो होती ,सूरज के बिना धूप नही होती चाँद के बिना चांदनी नही होती सर्दी के बिना बर्फ नही पडती पानी बिना झरने नही झरते और गुंडों के बिना झगड़े नही होते महिलाओं के बिना बातें नही होती नेताओं के बिना बदमाशी नही होती ऐसे ही भला मुन्नी की बदनामी को गए या बजाये बिना भला कोई कार्यक्रम कैसे सम्पन्न हो सकता है |
अब लोगों में मुन्नी की बदनामी की चरों ओर फ़ैल रही ख्याति से बड़ी ईर्ष्या या जलन होने लगी पर इस में ईर्ष्या की क्या बात हुई यह तो नसीब अपना अपना लोग धर्म क्रम करते २ बूढ़े हो २ कर मर भी जाते हैं जिन्दगी भर लगे रहते हैं कीर्तन कर २ के पड़ोसियों का जीना हराम कर देते हैं ,रात २ भर जागरण कर २ के सब की नींद उदय रहते हैं या देश सेवा में पूरा जीवन लगा देते हैं आदि २ तो भी उन्हें ऐसी मुन्नी की बदनामी जैसी ख्याति भला कहाँ मिल पाती है जो मुन्नी की बदनामी को मिली मिली क्या पूरे जहाँ में यह बदनामी खूब प्रख्यात व कुख्यात हो गई |
मुन्नी की बदनामी की ख्याति लोगों से देखी नही गई उन्हें उस से जलन होने लगी तो उन्होंने सोचा क्यों न उस की इस बदनामी को भुनाया जाये या इस ख्याति को अपने लिए कैसे इस्तेमाल किया जाये |इस लिए उन्होंने मुन्नी की बदनामी का सहारा ले कर फिर दिल्ली को बदनाम करने का बीड़ा उठाया और और उन्होंने इस के लिए मुन्नी की जगह फिर से दिल्ली शब्द लगा दिता और फिर वही पुराना राग बजाना शुरू कर दिया "दिल्ली बदनाम हुई कोंम्वेल्थ तेरे लिए "और दिल्ली की इस बदनामी को बिजली तरंग चालित त्वरित डाक सेवा यानि ईमेल यत्र तत्र सर्वत्र बड़ी सहजता पूर्वक प्रेषित कर दिया जिस के परिणाम स्वरूप फिर से मुन्नी की जगह दिल्ली बदनाम हो गई
पर इस में लोगों को कोई नई बात नजर नही आई जो मुन्नी की बदनामी में है क्योंकि बेचारी दिल्ली तो यूं ही समय पर बदनाम होती ही रही है उस की यह बदनामी आज से नही है अपितु प्राचीन युगों से है हर युग में हर काल में दिल्ली बदनाम हुई है दिल्ली को बदनाम करने के लिए सश्कों या राजनेताओं ने क्या नही किया चाहे मुसलमान आक्रान्ता हों चाहे विदेशी गोरे अंग्रेज या फिर उन के बाद के काले अंग्रेज किसी ने भी इस में कोई कोर कसर बाक़ी ही छोड़ी
जब विदेशी आक्रान्ता आये तो उन्होंने दिल्ली को खूब लूटा लूटा ही नही कत्ले आम तक खूब किया और यहाँ तक कि दिल्ली को दिल्ली भी नही रहने दिया कहीं और दूर दिल्ली बनाने की बहुत कोशिश की सब कुछ उजड़ गया कहते हैं जो चल नही स्क्लते थे उन्हें हठी के पैर से बंधवा दिया ताकि वे दूसरी जगह बनाई गई दिल्ली में जा कर बस जाएँ परन्तु डाल नही गल सकी क्योंकि दिल्ली तो दिल्ली ही थी भला दूसरी जगह दिल्ली कैसे बन जाती तो फिर उन्हें उलटे पैर वापिस दिल्ली ही लौटना पड़ा और दिल्ली को ही दिल्ली बनाना पड़ा परन्तु सबसे ज्यादा नुकसान उठाया बेचारी दिल्ली ने और भी सश्कों ने दिल्ली की मानवतावादी संस्कृति को नष्ट करने में कोई कसर नही छोड़ी उन्होंने मन्दिर तोड़े बल्कि यहाँ तक कि धर्म गुरूओं तक का शीश तक कटवा दिया सुंदर कन्याओं को मीणा बाजार के बहाने उठवा दिया जाता था यही नही ऐसे कितने ही घिनोने काम उन्होंने किये और उस के बाद मरने पर भी जगह २ जमीन में गढ़ कर जमीन घेर ली |
कुछ समय तक तो इन की खूब चली पर हमेशा सूरज सिर पर नही रहता शाम को डूबता ही है ऐसे ही इन का सूरज भी डूबा और अंग्रेज का सूरज उदय हो गया फिर उन्होंने दिल्ली को खूब बदनाम किया दिल्ली पर पूरा कब्जा कर लिया जसे गाँव का साहूकार कर्ज दे कर कर लेता है फिर उसे अपनी मिल्कीयत बना कर ऐश आराम शुरू कर देता है वैसे ही अंग्रेजों ने किया पर वे भी भूल गये कि भला बदनाम चीज भी आज तक किसी कि हुई है आखिर उन्हें भी जाना पड़ा सत्ता का ह्स्तान्त्र्ण हुआ वे अपने जैसों को दिल्ली सौंप कर यहाँ से आधी रात में ही खिसक गए
उन के बाद उन के उत्तराधिकारियों ने बाक़ी कसर पूरी करनी शुरू की जो अब तक जरी है पिछला इतिहास तो आप को पता ही होगा वैसे पता कोई नही रखता सब भूल जातें हैं आपात काल जैसी घटनाओं को तक को भी जब लोग भूल गए तो फिर इतिहास में तो बहुत पुराने मुर्दे गढ़े हुए हैं उन्हें कौन उखड़ेगा इतनी फुर्सत भला किस को है पर एक बात है कि लोग तजा २ मामलों को तो खूब चाट की तरह चटखारे ले ले कर मजे लेते हैं जैसे कोम्न्वेल्थ या और उस के बाद के नए २ घोटाले जिन पर खूब हो हल्ला हो रहा है अंदर भी बाहर भी क्योंकि ऐसी तजा २ चीजें तो कुछ दिन याद कर रख ही लेते हैं बाक़ी तो दिल्ली वालों को भूलने की पक्की बीमारी है प्याज तक पर तो जोश आया था पर जब सब चीजे ही मंहगी हो गई तो वे प्याज को भला क्यों याद रखते इसी लिए वे फिर दिल्ली कि बदनामी को भूल कर मुन्नी की बदनामी पर आगये जिस का जादू अपने देश में ही नही विदेश तक में सिर चढ़ कर बोल रहा है

4 comments:

अरुण चन्द्र रॉय said...

रोचक आलेख

rajiv srivastava said...

sir ji !shabd nahi hai itne jagrook karne wale rachna ke prashansa hetu.kya baat hai .saachchi ko bakhubi likha hai aap ne --badahai

L.R.Gandhi said...

भाई साहेब मुन्नी तो उसका निक्क नेम है -असली नाम तो दिल्ली ही है , सो बदनाम मुन्नी हो या दिल्ली सबब 'एक ही' है.

जैसे चोरों का सरदार फिर भी सिंह 'इमानदार?' भला कैसे ?

शानदार झंडू बाम लगाई है आपने - देखो असर कब होता है ?.... उतिष्ठकौन्तेय

sushil said...

Dr sahab kya khoob badnam kiya hai dilli ko. bahut sari kadvi haqeequten khol ker rakh di. per bhulne vaali bimari ka kya kiya ja sakta hai.
Bahut achcha likh hai badhai ho.

Sushil Sharma