Wednesday, June 9, 2010

मित्रों !
जिसे हिंदी गजल कहा जा रहा है वास्तव में तो वह हिंदी की गीति परम्परा से आई गीतिका है इस का यह नाम भी कुछ दिन चला पर बिना उर्दू की बहर के ज्ञान के गजल लिखने वाले इसे गजल ही कहते रहे
उन से प्रश्न है किजैसेहिंदी में दोहा लिखने के लिए १३-११कि यति अंत में गुरु और लघु मात्रा आवश्यक है यदि ये मात्राएँ पूरी नही हों तो वह रचना दोहा नही होती उसी प्रकार बहर के बिना गजल कैसे हो सकती है जब कि हिंदी में हर दो पंक्ति में लिखी रचना को गजल कहने का प्रचलन शुरू कर दिया है
वास्तव में ऐसी रचनाएँ गजल नही हैं उन्हें "नव गीतिका "नाम दिया गया है इस सन्दर्भ में" समवेत सुमन ग्रन्थ माला"पत्रिका के कुछ अंक दृष्टव्य हैं ऐसी ही एक रचना प्रस्तुत है :-
वर्षा बादल पानी पानी हर पल मुझ को याद रहा
तेरी आँख का आँसू आँसू हर पल मुझ को याद रहा
झूठे जाहिल मक्कारों ने देश का सब कुछ लूट लिया
फाँसी फंदा दिवानो का हर पल मुझ को याद रहा
महल अटारी कोठी बंगला मुझ से दूर बहुत थे वे
टूटी छान टपकता छप्पर हर पल मुझ को याद रहा
कहने को हर पल कोई न कोई कसम उठाते वे
सच्चाई उन में कितनी है हर पल मुझ को याद रहा
चाउमीन पिज्जा केक पेस्ट्री मुझ को याद नही आई
कंगाली में आटा गीला हर पल मुझ को याद रहा
जब जब बिजली गिरी और अम्बर नौ नौ आँसू रोया
धरती का जब फटा कलेजा हर पल मुझ को याद रहा
कभी एक पल शीतलता के झोंके आये थे कितने
पर जब शीतल झोंका आया वो पल मुझ को याद रहा
डॉ. वेद व्यथित

5 comments:

माधव said...

nice

Parul said...

sir ..ye bhigi si yaaden..jismein har lafz dooba hai..kamaal ki hai!!

vedvyathit said...

दोनो सह्रिद्य मित्रोन का हार्दिक आभार
यह स्नेह बनाये रखिये
. वेद व्यथित

vedvyathit said...

दोनो सह्रिद्य मित्रोन का हार्दिक आभार
यह स्नेह बनाये रखिये
. वेद व्यथित

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब लिखा है ! शुभकामनायें !