Tuesday, April 3, 2012

प्यास

प्यास


प्यास
प्यास बहुत बलवती प्यास ने कितने ही सागर सोखे
प्यास नही बुझ सकी प्यास बुझने के हैं सारे धोखे
प्यास यदि बुझ गई तो समझो आग भी खुद बुझ जाएगी
प्यास को समझो आग ,आग ही रही प्यास को है रोके ||
प्यास बुझी तो सब कुछ अपने आप यहाँ बुझ आयेगा
यहाँ चमकती दुनिया में केवल अँधियारा छाएगा
इसीलिए मैंने अपनी इस प्यास को बुझने से रोका
प्यास बुझी तो दिल भी अपनी धडकन रोक न आयेगा
लगता है प्यासों को पानी पिला पिला कर क्या होगा
पानी पीने से प्यासे की प्यास का तो कुछ न होगा
प्यास कहाँ बुझ पाती है बेशक सारा सागर पी लो
सागर के पानी से प्यासी प्यास का तो कुछ न होगा
कितनी प्यास बुझा लोगे तुम बेशक कितने घट पी लो
कितनी प्यास और उभरेगी बेशक इसे और जी लो
जब तक प्यास को बिन पानी के प्यासा ही न मारोगे
तब तक प्यास कहाँ बुझ सकती बेशक तुम कुछ भी पी लो
आभार सहित
वेद व्यथित
अनुकम्पा -१५७७ सेक्टर ३
फरीदाबाद १२१००४

5 comments:

Sawai Singh Rajpurohit said...

सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन पोस्ट

Sawai Singh Rajpurohit said...

आप को सुगना फाऊंडेशन मेघलासिया,"राजपुरोहित समाज" आज का आगरा और एक्टिवे लाइफ
,एक ब्लॉग सबका ब्लॉग परिवार की तरफ से सभी को भगवन महावीर जयंती, भगवन हनुमान जयंती और गुड फ्राइडे के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ॥
आपका
सवाई सिंह{आगरा }

डा. श्याम गुप्त said...

भाई वेद जी साहित्य की सर्जना होती है या सृजन .... क्या सही है...

yashoda agrawal said...

डॉ. श्याम गुप्त जी
सही शब्द सृजन ही है
सर्जक भी सही शब्द है...
सृजन करने वाला ही सर्जक कहलाएगा
कहीं पर कोई गलत नहीं है
सादर
यशोदा

पंछी said...

bahut sundar