Sunday, January 1, 2012

muktk






करो तसल्ली लोक पल बिल हम ही तो बनवायेंगे
अपने मन से जैसा चाहे हम उस को बनवायेंगे
चाहे तुम कितने भी उस में संशोधन ले कर आना
पर मर्जी जो अपनी होगी उस को ही बनवायेंगे ||

साठ साल से करी तस्सली और साठ लग जायेंगे
कह तो दिया अभी हम ने हम भ्रष्टाचार मिटायेंगे
जब तक स्विस बैंक का पैसा इधर उधर न कर लेंगे
तब तक हम अपने पैरों पर नही कुल्हाड़ी खायेंगे ||

हम को दोष किस लिए देते हम तो हैं बिल ले आये
तुम ही उस में इतने २ संशोधन ले कर आये
अगर सभी संशोधन इस में पास यदि हम कर देते
फिर तो अगले दिन से हम को जेल के अंदर कर देते ||

यदि पास हो जायेगा ये लोक पल बिल संसद में
तब तो एक दरोगा आ कर पकड़ सकेगा संसद में
ऐसे लोक पाल की हड्डी गले नही फंसने देंगे
इस के टुकड़े २ कर के फेंकेंगे हम संसद में ||
कैसी बेशर्मी हैं ये वे दोष दूसरों को देते
उन की मंशा जग जाहिर है पर वे उस को क्यों कहते
इसी लिए कुछ भी कह कर वे खुद की खाल बचायेंगे
और दूसरों के माथे पर खूब दोष मढ़ जायेंगे||



3 comments:

वन्दना said...

सच्चाई व्यक्त करते शानदार मुक्तक्।

प्रवीण पाण्डेय said...

न जाने कितने भय नाचे हैं इसके सामने।

Sawai Singh Rajpurohit said...

सुन्दर एवं सार्थक रचना!