Thursday, December 1, 2011

ओ हिम सुन्दरी !

ओ हिम सुन्दरी !
एक नया नाम दे दिया तुम ने
उस चट्टानी पर्वत को
और तुम्हारे अपनाने से
ख्यात हो गया वह
तुम्हारे नाम से
जिस के कारण ही
पत्थर के बजाय
बन गया वह -
हिमालय या हिमवान ||
ओ हिम सुन्दरी !
तुम ने ही कर दिया उसे रससिक्त
जिस के कारण निसृत हुई
उस के हृदय से
अमृतोपम निर्झरी
जो साक्षात् तुम ही थीं
सोचता हूँ !
यदि तुम नही अपनाती उसे
तो पत्थर ही बना रहता वह
कठोर और तप्त पत्थर
परन्तु तुम ने अपना रूप दे कर
रुपहला बना दिया उसे
बेशक ,
उसे रुपहला बनाये रखने के लिए
तुम और भी सहती रहीं
भयंकर शीत को
ताकि तुम्हारा प्रेमांचल
मिलता रहे उसे निरंतर
फिर भी कहाँ छोड़ा तुमने
अपना स्त्रीत्व व सतीत्व
जिस के कारण मिला उसे शिवत्व
और नत हो गई जगती
उस के प्रति |
ओ हिम सुन्दरी !
धन्य कर दिया तुम ने उसे
क्यों कि
अपना अस्तित्व खो कर भी
प्रकट होती रही तुम
कभी उस के शिवत्व में
कभी अमरत्व में
और कभी जीवन के कण कण में
ओ हिम सुन्दरी ||

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

हिम की शीतलता से बदला स्वरूप।

Point said...

sundar ji ...saral sundar

Naveen Mani Tripathi said...

SUNDAR RACHANA KE LIYE BADHAI ..... AK PRASHN APKI PROFIL ME PUNAR JANM SE SAMBANDHI ANUSANDHAN KA JIKR HAI . ... KY APKE ANUSANDHAN KE BARE ME CHARCH KR SAKTA HOON ? MAI JANANA CHAHTA HOON .. KYA SACH HAI .