Wednesday, November 2, 2011

हम नई लीक बनाई क्यों है

हम ने लीक बनी क्यों है

मौन साधना भंग हुई तो
इस में शब्द कहाँ दोषी हैं
नभ से तारा टूट गिरा तो
इस में वह कहाँ दोषी है

दोष दूसरों को देने की
हम ने लीक बनाई क्यों है ||

आखिर कितनी देर रहे दिन
सूरज को भी ढल जाना है
रात चांदनी भी ढल जाती
और अमावस को आना है

फिर अंधियारे से नफरत की
जाने रीत बनी क्यों है ||

जो भी रंग आकर्षित करते
सारे फीके पड़ जाता हैं
कितने आकर्षित यौवन हो
सारे ढीले पड़ जाते हैं
फिर क्यों बेरंगी सांसों से
दूरी खूब बनाई क्यों है ||

9 comments:

वन्दना said...

सार्थक सोच को दर्शाती कविता।

प्रवीण पाण्डेय said...

दोष निकालने वाला समाज सदा ही दोषभरा रहता है।

anju(anu) choudhary said...

अपनी ही गलतियों से भागने के लिए ....हमने ये लीक बना डाली ....

बहुत ही सार्थक सोच के साथ आपकी ये कविता .......आभार

Monika Jain said...

humesha hum apni galtiya chipane ke liye dusro me dosh dhundte hai.....very nice :)

"पलाश" said...

a good poem ,which gives us a great message...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...





आदरणीय वेद व्यथित जी
सादर अभिवादन !

आपके यहां पहुंच कर प्रसन्नता हुई ।
प्रस्तुत गीत के भाव बहुत श्रेष्ठ है …
आख़िर कितनी देर रहे दिन
सूरज को भी ढल जाना है
रात चांदनी भी ढल जाती
और अमावस को आना है

फिर अंधियारे से नफ़रत की
जाने रीत बनी क्यों है ?


बहुत सुंदर !

सविनय निवेदन यह है कि गीत के तुकांत समान होते तो आनंद आ जाता … बनी क्यों है , बनाई क्यों है कुछ खटक रहा है …


हार्दिक मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...





आदरणीय वेद व्यथित जी
सादर अभिवादन !

आपके यहां पहुंच कर प्रसन्नता हुई ।
प्रस्तुत गीत के भाव बहुत श्रेष्ठ है …
आख़िर कितनी देर रहे दिन
सूरज को भी ढल जाना है
रात चांदनी भी ढल जाती
और अमावस को आना है

फिर अंधियारे से नफ़रत की
जाने रीत बनी क्यों है ?


बहुत सुंदर !

सविनय निवेदन यह है कि गीत के तुकांत समान होते तो आनंद आ जाता … बनी क्यों है , बनाई क्यों है कुछ खटक रहा है …


हार्दिक मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Parminder said...

blame game kaa zamaana hai na, apni kami ko chipaanaa hee to har kisi kaa maksad ho gaya hai. Very well expressed!

संजय भास्कर said...

वाह ...बहुत खूब कहा आपने ...