Saturday, March 10, 2012

काजल की रेख

आकर्षण

काजल की रेख कहीं
अंदर तक पैठ गई
तमस की आकृतियाँ
अंतर की सुरत हुईं

मन को झकझोर दिया
गहरी सी सांसों ने ||

दूर कहाँ रह पाया
आकर्षण विद्युत सा
अंग अंग संग रहा
तमस बहु रंग हुआ

गहरे तक डूब गया
अपनी ही साँसों में ||

चाहा तो दूर रहूँ
शक्त नही मन था
कोमल थे तार बहुत
टूटन का डर था

सोचा संगीत बजे
उच्छल इन साँसों में ||

जो भी जिया था
उस क्षण का सच था
किस ने सोचा ये
आगे का सच क्या

फिर भी वो शेष रहा
जीवन की सांसों में ||

7 comments:

vandan gupta said...

sundar prastuti

अरुण चन्द्र रॉय said...

bahut sundar kavita

Shanti Garg said...

बहुत बेहतरीन....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

प्रवीण पाण्डेय said...

वर्तमान का सच ही जागता है..

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' said...

वाह...

Divya Narmada said...

bahut khoob.

अवनीश सिंह said...

जो बीत जाता है वह शेष कहाँ रहता है, शेष रहती हैं तो सिर्फ उसकी स्मृतियाँ