Saturday, June 12, 2010

मित्रों यह गजल नही है जैसा मैंने पहली पोस्ट में कहा है यह "नव गीतिका "है
पावस ऋतू प्रारम्भ हो रही है इस लिए बदल बूँदें बरसात व फुहार से ही इस का साधारणीकरण होता है ये तत्व ही सहृदयी को पावस का अहसास कराते हैं इसी पर यह नव गीतिका है
ध्यान से निकला करो मौसम सुहाना है
कब बरस जाये यह बादल दीवाना है
चौंक मत जाना कभी बिजली कीगहरी कौंध से
इस तरह ही देखता सब को जमाना है
पींग धीरे से बढ़ाना संग में मल्हार के
देख ये कब से रहा बरगद पुराना है
झिम झीमा झिम पड़ें जब मेहकी बूंदे
सम्भल कर चलना नही दिल टूट जाना है
बैठ लो कुछ देर सुस्ता लें जरा इस छाँव में
हाल अपना आप का सुनना सुनाना है
जब कभी आना तो इत्मिनान से आना
वरना भागम भाग में रहता जमाना है
बीच जुल्फों से कभी नजरें उठा कर देखना
क्या अदा है देख कर पर्दा गिरना है
बात न करना कभी इतर के मुंह को फेरना
क्या बताएं शौक ये उन का पुराना है
ख़्वाब फिर फिर देखना इस बुरा क्या है
सहारे उम्मीद के ही ये जमाना है
हाथ में लकुटी कमरिया और अपने पास क्या
मन किया जब बिछा लई वो ही ठिकाना है
सहन कर लो वेद ये बेदर्द दुनिया है
क्यों किसी को व्यथा का किस्सा सुनना है
डॉ. वेद व्यथित

7 comments:

फ़िरदौस ख़ान said...

अति सुन्दर...

vandan gupta said...

्वाह्……………बहुत ही सुन्दर्…………॥कल के चर्चा मंच पर आपकी पोस्ट होगी।

M VERMA said...

बहुत बढिया

hem pandey said...

'क्यों किसी को व्यथा का किस्सा सुनना है'

- रहिमन मन की व्यथा मन ही राखो गोय.

Unknown said...

अति उत्तम

Satish Saxena said...

"सहन कर लो वेद ये बेदर्द दुनिया है
क्यों किसी को व्यथा का किस्सा सुनना है"

लगा जैसे आपने मेरी व्यथा कलमबद्ध कर दी, सच कहा है दूसरे की व्यथा हम क्यों समझें ?? शुभकामनायें भाई जी !

डा श्याम गुप्त said...

अच्छी हिन्दी गज़ल या नव गीतिका जो भी कहें, वैसे गज़ल है