Tuesday, November 10, 2009

सागर

सागर
वह तो कुछ भी गहरा नही था
तुम्हारे मन के आगे
आखिर अब था हीं क्या उस में
कामधेनु,उर्वशी,रत्न और अमृत आदि तो
पहले ही निकल लिए गयें हैं उस में से
परन्तु तुम्हारा मन तो अब भी
अथाह भंडार है -
प्यार का ,ममता का ,स्नेह का,
सम्बल का प्रेरणा का
और न जाने कौन कौन से अमूल्य रत्नों का I
बेशक
अपार करुना ,व्यथा, पीडा ,
वेदना और न जाने क्या क्या
अब भी समाहित होता जा रहा है तुम्हारे मन में
परन्तु फिर भी उथली नही है
जिस कि थाह सागर सी
सोचता हूँ कितना घर है तुम्हारा मन
सागर से तो अनेक गुना गहरा और सामर्थ्य वान भी
जिस में समाप्त नही होता है -
उर्वशी का लावण्य,
कामधेनु कि समृधि
पीडा का ममत्व ,
लक्ष्मी का विलास
और तृप्ति का अमृत

1 comment:

पंछी said...

man ki gahraiyon ko darshati sundar rachna..aabhar :)