Friday, March 7, 2014


स्त्री यानि औरत

जिस की मजबूरी है 
घर की आमदनी  बढ़ाना  या 
आधुनिकता की दौड़ में शामिल होना 
इसी लिए निकलना पड़ता है उसे 
घर से सुबह सवेरे जल्दी ही 
सब की इच्छाएं पूरी करते हुए 
टिफिन , टाई  , रुमाल , जुराब और 
जरूरी चीजें संभलवा    कर 
फिर भागना पड़ता है उसे 
अपना नाश्ता छोड़ कर 
भीड़ भरे वाहनों में घुसने के लिए 
अपने खाली  से पर्स 
औ दूसरे  सामान के साथ 
साडी और साडी के पल्लू को सम्भालते २
आधुनिकता  और मजबूरी के बोझ को 
साथ २ ढोते  हुए ।
इसी तरह आती है वह शाम को 
सारा बोझ ढो कर 
जो और भारी  हो जाता है घर पहुँचते २ 
और उतरता भी नही है 
अन्य  सामान की तरह मन से
 घर आने पर भी 
अपितु और बढ़ जाता है वह 
दिन प्रति दिन यानि हर दिन 
दुगना हो कर ॥  

Tuesday, March 4, 2014

परमेश्वर कि अनुकपमा और मित्रों कि शुभकामनाओं के कारण मेरे काव्य संकलन " अंतर्मन " का सिक्किम में नेपाली भाषा में अनुवाद हुआ है। इस का अनुवाद मेरे मित्र  , नेपाली भाषा के सुकवि श्री अमर बानियाँ " लोहरो " ने  किया है तथा  डोगरी भाषा के प्रख्यात साहित्यकार डॉ सुवास  दीपक जी ने इस पुस्तक की भूमिका लिख कर उपकार किया है तथा आवरण पृष्ठ को संजोने और संवारने में  प्रसिद्ध चित्रकार दीपा राई जी ने अपना अमूल्य सहयोग दिया है।  
मैं बंधु अमर बानियाँ जी ,डॉ सुवास दीपक जी व दीपा जी के प्रति अपनी कृत्यज्ञता ज्ञापित करता हूँ और यह प्रसन्नता आप के साथ बांटने का सौभाग्य प्राप्त कर रहा हूँ।  इसे आप का स्नेह मिलेगा ही।  
डॉ वेद व्यथित 
09868842688   

Monday, February 24, 2014

प्यास
 
प्यास बहुत बलवती प्यास ने कितने ही सागर सोखे
प्यास  नही बुझ सकी प्यास बुझने के हैं सारे धोखे
प्यास यदि बुझ गई तो समझो आग भी खुद बुझ जाएगी
प्यास को समझो आग ,आग ही रही प्यास को है रोके ||
 
प्यास बुझी  तो सब कुछ अपने आप यहाँ बुझ आयेगा
यहाँ चमकती दुनिया में  केवल अँधियारा छाएगा
इसीलिए मैंने अपनी इस प्यास को बुझने से रोका 
प्यास बुझी तो  दिल भी अपनी धडकन रोक न आयेगा 
 
लगता है  प्यासों  को पानी पिला पिला कर क्या होगा 
पानी पीने से प्यासे की  प्यास का तो कुछ न होगा
प्यास कहाँ बुझ पाती  है बेशक  सारा सागर पी लो
सागर के पानी से प्यासी प्यास का तो  कुछ न होगा  
 
कितनी प्यास बुझा लोगे तुम बेशक कितने घट पी लो 
कितनी प्यास और उभरेगी बेशक इसे और जी लो 
जब तक प्यास को बिन पानी के  प्यासा ही न मारोगे
तब तक प्यास कहाँ बुझ सकती बेशक तुम कुछ भी पी लो 
आभार सहित
वेद व्यथित
अनुकम्पा -१५७७ सेक्टर ३ 
फरीदाबाद १२१००४ 

Friday, February 21, 2014

अँधेरे ही अँधेरे हैं उजाले छुप गये जा कर 
चलो हम रौशनी करने उन्हेंफिर ढूंढ लाते हैं |
तपिश जो बढ़ गई है आसमां से आग बरसी है 
चलो उस आग को हम खून दे कर बुझा आते हैं |
सुना है हर तरह वे अपनी बातें ही सही कहते 
चलो हम आइना उन का उन्ही को दिखा आते हैं |
नही वे मानते कब हैं कभी अपने किये को ही
उन्ही के कारनामों को उन्हें ही दिखा आते हैं |
बहुत आसन कब है खुद की गलती मान भर लेना
चलो उन की कही बातें उन्ही को बता आते हैं |
फुंके अपना ही घर बेशक उजाले तो जरूरी हैं
चलो हम दीया लेकर फूंक अपना घर ही आते हैं |

डॉ. वेद व्यथित
०९८६८८४२६८८

Saturday, February 8, 2014

आदरणीय जनों व मित्रों के सद्भाव के कारण यहाँ गुलाब पर कुछ और पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ सम्भवत: इन्हे भी ऐसा ही स्नेह व प्यार मिलेगा।  
ये रचनाएं मैंने लगभग बीस  वर्ष पूर्व लिखीं  थीं और यूं ही रख छोड़ीं थीं पता नही कैसे ये पन्ने फिर खुल गये हैं।  

कोमलता से बांटता अपनी गंध गुलाब 
भंवरों को भर अंजुरी उस ने दिया प्राग 
सब कुछ तो उस ने दिया अपना मन और देह 
फिर वह क्यों तोडा  झटक यह था कैसा नेह। 

कोमलता उस की हुई उस को ही अभिशाप
काँटों से बचता हुआ पहुंचा उस के पास
 बेरहमी से तोड़ कर लिया हाथ में भींच 
शिकवा अब किस से करे कैदी बना गुलाब। 

जिस दिन से खिलने लगा छूने लग गई धूप 
मेरा खिलना लाजमी धुप भी थी मजबूर 
कुछ दिन  तो उस ने सहा उस का मीठा ताप  
पर कितने दिन झेलता धुप की तीखी आग।  

मन की बगिया में खिला एक गुलाबी फूल 
यह क्या सचमुच फूल था या थी केवल भूल 
भूल हुई तो क्या हुआ उपजा तो है फूल 
कभी कभी यह भूल भी बन जाती है फूल। 

ऐसा क्या मैंने कहा मुरझा गया गुलाब 
बिन समझे ही रूठ कर हुआ वह बेहाल 
फिर भी इस के हाल पर मुझ को रहा मलाल 
मैं तो फिर भी धुप था वह था निपट गुलाब।
डॉ वेद व्यथित 
०९८६८८४२६८८ 
बाद में अभी गुलाब से आप का संवाद और करवाऊंगा   

Thursday, January 2, 2014

प्यारी पीड़ा

प्यारी पीड़ा 

पीड़ा इतनी प्यारी क्यों है 
हृदय सीप  में मोती जैसी 
यह इतनी उजयारी क्यों है ? 

जो जो भूल हुईं जीवन में 
भूला कब हूँ याद  सभी हैं 
एक एक कर सभी सामने 
हर दिन खुद आ जाती क्यों हैं 
बहुत चाहता भूलूं उन को 
पर वे भूलें प्यारी क्यों हैं ?

जिन रस्तों पर खूब चला हूँ 
उन से ही क्यों ऊब रहा हूँ 
नई  राह की  चाह लिए क्यों
 मंजिल मंजिल भटक रहा 
नई नई मंजिल अनजानी  
लगती इतनी प्यारी क्यों हैं ?

गहन तिमिर की स्याह निशा में 
आँखों की कोशिश रहती हैं 
अंधकार के चित्र बना कर  
छूने की कोशिश रहती है
 हवा गुजरती यदि निकट से 
आखों को दिख जाती क्यों है ?

बैठे बैठे गहन शून्य में 
कितने रंग भरे सपनों में 
गहन तमस  में आँखें कैसे 
रंग सजाती  है सपनों में 
बिना बात सपनों की माला 
आँखें रोज सजातीं क्यों हैं ??

डॉ वेद व्यथित 
अनुकम्पा -१५७७ सेक्टर - ३ 
फरीदाबाद -१२१००४ 
09868842688 

Wednesday, December 11, 2013

फ़िरदौस ख़ान ने किया वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद.

यह उर्दू जगत की महान पत्रकार शख्शियत मेरी बहन फिदौस खान कि रचना है यह उन का अद्वितीय कार्य है उन्हें साधू वाद देता हूँ

फ़िरदौस ख़ान ने किया वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद... 
-सरफ़राज़ ख़ान
लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी के नाम से जानी जाने वाली स्टार न्यूज़ एजेंसी की संपादक फ़िरदौस एवं युवा पत्रकार फ़िरदौस ख़ान ने वंदे मातरम का पंजाबी में अनुवाद किया है. वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है. इसकी रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने की थी. अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और वरिष्ठ साहित्यकार मदनलाल वर्मा क्रांत ने वंदे हिन्दी में अनुवाद किया था. भाजपा नेता आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया. गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला में हैं. राष्ट्रकवि रबींद्रनाथ ठाकुर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया था. भारत में पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है. इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा कर इसकी धुन और गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है, जो 52 सेकेंड है. 

वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ 
ਤੂੰ ਭਰੀ ਹੈ ਮਿੱਠੇ ਪਾਣੀ ਨਾਲ਼
ਫਲ ਫੁੱਲਾਂ ਦੀ ਮਹਿਕ ਸੁਹਾਣੀ ਨਾਲ਼
ਦੱਖਣ ਦੀਆਂ ਸਰਦ ਹਵਾਵਾਂ ਨਾਲ਼ 
ਫ਼ਸਲਾਂ ਦੀਆਂ ਸੋਹਣੀਆਂ ਫ਼ਿਜ਼ਾਵਾਂ ਨਾਲ਼ 
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ… 

ਤੇਰੀਆਂ ਰਾਤਾਂ ਚਾਨਣ ਭਰੀਆਂ ਨੇ
ਤੇਰੀ ਰੌਣਕ ਪੈਲ਼ੀਆਂ ਹਰੀਆਂ ਨੇ
ਤੇਰਾ ਪਿਆਰ ਭਿੱਜਿਆ ਹਾਸਾ ਹੈ
ਤੇਰੀ ਬੋਲੀ ਜਿਵੇਂ ਪਤਾਸ਼ਾ ਹੈ
ਤੇਰੀ ਗੋਦ 'ਚ ਮੇਰਾ ਦਿਲਾਸਾ ਹੈ
ਤੇਰੇ ਪੈਰੀਂ ਸੁਰਗ ਦਾ ਵਾਸਾ ਹੈ
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ… 
-ਫ਼ਿਰਦੌਸ ਖ਼ਾਨ   

मातरम का पंजाबी अनुवाद (देवनागरी में)
मां तैनूं सलाम
तूं भरी है मिठ्ठे पाणी नाल
फल फुल्लां दी महिक सुहाणी नाल
दक्खण दीआं सरद हवावां नाल
फ़सलां दीआं सोहणिआं फ़िज़ावां नाल
मां तैनूं सलाम…

तेरीआं रातां चानण भरीआं ने
तेरी रौणक पैलीआं हरीआं ने
तेरा पिआर भिजिआ हासा है
तेरी बोली जिवें पताशा है
तेरी गोद ’च मेरा दिलासा है
तरी पैरीं सुरग दा वासा है
मां तैनूं सलाम…
-फ़िरदौस ख़ान

वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद (रोमन में)
Ma tainu salam
Tu bhri hain mithe pani naal
Phal phulaan di mahik suhaani naal
Dakhan dian sard hawawaan naal
Faslan dian sonia fizawan naal
Ma tainu salam...

Tarian raatan chanan bharian ne
Teri raunak faslan harian ne
Tera pyaar bhijia hasa hai
Teri boli jiven patasha hai
Teri god 'ch mera dilaasa hai
Tere pairin surg da vasa hai
Ma tainu salam...
-Firdaus Khan

फ़िरदौस ख़ान पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं. वह कई भाषाओं की जानकार हैं. उन्होंने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में कई साल तक सेवाएं दीं. उन्होंने अनेक साप्ताहिक समाचार-पत्रों का सम्पादन भी किया. ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर उनके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है. उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है. वह देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और समाचार व फीचर्स एजेंसी के लिए लिखती रही हैं. प्रभात प्रकाशन समूह से उनकी 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नाम से एक किताब भी प्रकाशित हो चुकी है.  इसके अलावा वह डिस्कवरी चैनल सहित अन्य टेलीविज़न चैनलों के लिए स्क्रिप्ट लेखन भी करती हैं. उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल संपादन और लेखन के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है. इसके अलावा कवि सम्मेलनों और मुशायरों में भी वह शिरकत करती रही हैं. कई बरसों तक उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम भी ली. उर्दू, पंजाबी, अंग्रेज़ी और रशियन अदब (साहित्य) में उनकी ख़ास दिलचस्पी है. वह मासिक पैग़ामे-मादरे-वतन की भी संपादक रही हैं. फ़िलहाल वह स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं. 'स्टार न्यूज़ एजेंसी' और 'स्टार वेब मीडिया' नाम से उनके दो न्यूज़ पॊर्टल भी हैं.