जब हुए चर्चे तभी पहचान उन की हो सकी
वरना उन को इस शहर में जनता ही कौन था
चोट खा दुनिया से उन का मन भी हल्का हो गया
वरना मन के बोझ को पहचानता ही कौन था
हाथ सब ने ही उठाये थे समर्थन के लिए
सच जो कहता खड़ा हो शख्श ऐसा कौन था
सब तरफ बस एक ही चर्चा रही इस शहर में
कर दिया बदनाम मुझ को दोस्त ऐसा कौन था
नाम क्यों लेता किसी का जब हुआ बदनाम मैं
थी पता मुझ यह साजिश में शामिल कौन था
बढ़ रही थी भीड़ बिन सोचे उसे जाना कहाँ
रोकता जो भीड़ को वो शख्श ऐसा कौन था
आग को पी कर भी वो जिन्दा रहा दरसाल दर
एक मैं हूँ दूसरा तुम ही बताओ कौन था
बिन बताये नाम मेरा लिख दिया उस बुत पर
पर समझ आया नही वो लिखने वाला कौन था
इस शहर में हादसे का वक्त तुम से क्या कहूं
हादसा जब न हुआ हों वक्त ऐसा कौन था
दोस्त था दुश्मन था इस का फैसला कैसे करूं
दे गया जो फूल मेरे हाथ में वो कौन था
दोस्त था दुश्मन था इस का फैसला कैसे करूं
दे गया जो दाद मेरे शेर पर वो कौन था
याद मुझ को कहाँ थी मेरे जन्म दिन की तिथि
दे गया मुझ को बधाई शख्श ऐसा कौन था
Wednesday, August 18, 2010
Saturday, August 14, 2010
वन्दे मातरम
साल तरेसठ बीत गये हैं अब भी भ्रम में जीते हैं
कहने को आजाद हुए हैं मन ही मन खुश होते हैं
पर आजादी मिली कहाँ है सत्ता का हस्तान्तर है
बेशक खुश हो कर कहते हम आजादी में जीते हैं
पहले पाकिस्तान बनाया फिर सारी तिब्बत दे दी
दे उन को कश्मीर का हिस्सा सारी ही इज्जत दे दी
फिर समझौता कर शिमला में स्वाभिमान भी दे डाला
लगता है इस कांग्रेस ने फिर से वही आग दे दी
कहने को आजाद हुए हैं मन ही मन खुश होते हैं
पर आजादी मिली कहाँ है सत्ता का हस्तान्तर है
बेशक खुश हो कर कहते हम आजादी में जीते हैं
पहले पाकिस्तान बनाया फिर सारी तिब्बत दे दी
दे उन को कश्मीर का हिस्सा सारी ही इज्जत दे दी
फिर समझौता कर शिमला में स्वाभिमान भी दे डाला
लगता है इस कांग्रेस ने फिर से वही आग दे दी
Wednesday, August 11, 2010
नव गीतिका
बेशक तूने दुनिया देखी
पर पहले खुद को तो देख
क्या रखा है उन महलों में
पहले अपने घर को देख
देख इया होगा जग सारा
पर अपनी दुनिया तो देख
क्या बतलाऊँ तुझ को रे मन
सब कुछ अपने अंदर देख
कितनी दूर देख पायेगा
केवल अपनी जद में देख
कितना ऊँचा उड़ पायेगा
पहले इन पंखों को देख
करने को कुछ भी तू कर ले
पर करने से पहले देख
क्या २ मैंने शं कर लिया
मेरे इन जख्मों को देख
ये बातें तो ठीक नही हैं
देख रही है दुनिया देख
क्या कहना है तुम को उन से
पहले अपने दिल में देख
पैर बढ़ाना तब आगे को
पहले अपनी चादर देख
बड़ी बात कहने से पहले
नीला अम्बर सिर पर देख
यों तो कुछ भी खले बेशक
पर उस का मतलब तो देख
व्यथा तो दुनिया देती ही है
व्यथित यहाँ पर ये मत देख
पर पहले खुद को तो देख
क्या रखा है उन महलों में
पहले अपने घर को देख
देख इया होगा जग सारा
पर अपनी दुनिया तो देख
क्या बतलाऊँ तुझ को रे मन
सब कुछ अपने अंदर देख
कितनी दूर देख पायेगा
केवल अपनी जद में देख
कितना ऊँचा उड़ पायेगा
पहले इन पंखों को देख
करने को कुछ भी तू कर ले
पर करने से पहले देख
क्या २ मैंने शं कर लिया
मेरे इन जख्मों को देख
ये बातें तो ठीक नही हैं
देख रही है दुनिया देख
क्या कहना है तुम को उन से
पहले अपने दिल में देख
पैर बढ़ाना तब आगे को
पहले अपनी चादर देख
बड़ी बात कहने से पहले
नीला अम्बर सिर पर देख
यों तो कुछ भी खले बेशक
पर उस का मतलब तो देख
व्यथा तो दुनिया देती ही है
व्यथित यहाँ पर ये मत देख
Thursday, August 5, 2010
देश कीवर्तमान व्यवस्था पर कुछ मुक्तक
पत्थर बजी करें सडक पर और पुलिस को पीट रहे
जिस में खाते छेड़ उसी में करें देश को लूट रहे
फिर भी मौन साध कर चुप हो देख रहे हैं नेता
कैसी बेशर्मी क्या ऐसे भाग्य हमारे फूटे
berujgari ka hl क्या ye ptthar बाज़ीhota
kitna paisa मिला केंद्र से उस का क्या २ होता
मांगे कौन हिसाब देश के कैसे दुर्दिन आये
जितना मुंह में भरें रात दिन और भी छोड़ा होता
आखिर कब तक इसी तरह इज्जत लुटवाई जाएगी
बेरहमी से सम्म्पति कब तक जलवाई जाएगी
कोई तो सीमा होगी ये ऐसे कब तक होगा
गद्दी पर बैठे गद्दारों कभी शर्म क्या आएगी
क्यों न करते सख्त एक्शन ऐसी क्या मजबूरी
इज्जत लूट रहे आतंकी उन कि मर्जी चलती
हाथ पे हाथ धरे रहने से क्या वे राजी होंगे
सख्ती से शासन चलता है बात न ऐसे बनती
कश्मीर में कुछ कहते हैं दिल्ली जबां दूसरी
इसी दोहरे पन की आदत इन की कहाँ छूटती
ऐसी २ मक्कारी से बज नही ये आते
कैसी मक्कारी करते है क्यों न हमे दीखती
कुछ न ठेका लिया देश में हिन्दू को मितावाएंगे
बीके मिडिया कर्मी मिल कर कोर्स में ये गायेंगे
रोजी रोटी है इन की ये यही एक चिंता है
अपनी माँभी गली दे खुद ही खुश हो जायेंगे
बाहर आँख दिखा कर ये फिर चरणों में गिर जाते
जा कर मैडम के चरणों में बकरी से मिमियाते
अभी दान के लिए तरीके इन को सारे आते
सत्ता की खतिर ये गुंडे हिजड़े से बन जाते
शायद भारत के कर्मोंका भग्य विधाता रूठ गया
लगता है उन्नति का सूरज यहाँ अचानक डूब गया
गुंडा गर्दी लूट डकैती ये सब की सब आम हुई
कहाँ देश में अब शाशन है गुंडा शासन खूब हुआ
पत्थर बजी करें सडक पर और पुलिस को पीट रहे
जिस में खाते छेड़ उसी में करें देश को लूट रहे
फिर भी मौन साध कर चुप हो देख रहे हैं नेता
कैसी बेशर्मी क्या ऐसे भाग्य हमारे फूटे
berujgari ka hl क्या ye ptthar बाज़ीhota
kitna paisa मिला केंद्र से उस का क्या २ होता
मांगे कौन हिसाब देश के कैसे दुर्दिन आये
जितना मुंह में भरें रात दिन और भी छोड़ा होता
आखिर कब तक इसी तरह इज्जत लुटवाई जाएगी
बेरहमी से सम्म्पति कब तक जलवाई जाएगी
कोई तो सीमा होगी ये ऐसे कब तक होगा
गद्दी पर बैठे गद्दारों कभी शर्म क्या आएगी
क्यों न करते सख्त एक्शन ऐसी क्या मजबूरी
इज्जत लूट रहे आतंकी उन कि मर्जी चलती
हाथ पे हाथ धरे रहने से क्या वे राजी होंगे
सख्ती से शासन चलता है बात न ऐसे बनती
कश्मीर में कुछ कहते हैं दिल्ली जबां दूसरी
इसी दोहरे पन की आदत इन की कहाँ छूटती
ऐसी २ मक्कारी से बज नही ये आते
कैसी मक्कारी करते है क्यों न हमे दीखती
कुछ न ठेका लिया देश में हिन्दू को मितावाएंगे
बीके मिडिया कर्मी मिल कर कोर्स में ये गायेंगे
रोजी रोटी है इन की ये यही एक चिंता है
अपनी माँभी गली दे खुद ही खुश हो जायेंगे
बाहर आँख दिखा कर ये फिर चरणों में गिर जाते
जा कर मैडम के चरणों में बकरी से मिमियाते
अभी दान के लिए तरीके इन को सारे आते
सत्ता की खतिर ये गुंडे हिजड़े से बन जाते
शायद भारत के कर्मोंका भग्य विधाता रूठ गया
लगता है उन्नति का सूरज यहाँ अचानक डूब गया
गुंडा गर्दी लूट डकैती ये सब की सब आम हुई
कहाँ देश में अब शाशन है गुंडा शासन खूब हुआ
Wednesday, August 4, 2010
नव गीतिका
तुम्हारी याद में मैंने बहुत आंसू लुटाये हैं
वही मोती बने हैं रात भर वो जगमगाते हैं
तुम्ही ने जो कहे दो बोल मीठे प्यार के मुझ से
ये पक्षी चाव से उन को ही हर पल गुनगुनाते हैं
तुम्हे मेरा पता है जानते हो हाल तुम सारा
पपीहा बादलों कोही उसे गा कर सुनते हैं
तुम्हारी गंध चन्दन सी हमेशा पास रहती है
उसे दिल में बसा कर फूल दुनिया में लुटाते हैं
जहाँ से तुम गुजरते हो धूल अनमोल हो जाती
उसे चन्दन समझ कर लोग माथे पर लगाते हैं
तुम्हारे नेह की वरिश यह अमृत की बूँदें हैं
इन्ही बूंदों से अपनी प्यास सब चातक बुझाते हैं
तुम्हे कैसे लगा ये हिम शिखिर इतने निठुर होंगे
यही तो नेह के मीठी बहुत नदियाँ बहाते हैं
बहुत जो दूर से आते भरोसा क्या करें उन का
वे पाखी कुछ समय के बाद वापिस लौट जाते हैं
अँधेरा कब अच्छा उदासी ही वह देता
सुभ सूरज निकलता है कमल सब खिलखिलाते हैं
कभी देखा सुना न आज तक ऐसा किया क्या है
व्यथित की बात क्या ऐसी जिसे सब को बताते हैं
वही मोती बने हैं रात भर वो जगमगाते हैं
तुम्ही ने जो कहे दो बोल मीठे प्यार के मुझ से
ये पक्षी चाव से उन को ही हर पल गुनगुनाते हैं
तुम्हे मेरा पता है जानते हो हाल तुम सारा
पपीहा बादलों कोही उसे गा कर सुनते हैं
तुम्हारी गंध चन्दन सी हमेशा पास रहती है
उसे दिल में बसा कर फूल दुनिया में लुटाते हैं
जहाँ से तुम गुजरते हो धूल अनमोल हो जाती
उसे चन्दन समझ कर लोग माथे पर लगाते हैं
तुम्हारे नेह की वरिश यह अमृत की बूँदें हैं
इन्ही बूंदों से अपनी प्यास सब चातक बुझाते हैं
तुम्हे कैसे लगा ये हिम शिखिर इतने निठुर होंगे
यही तो नेह के मीठी बहुत नदियाँ बहाते हैं
बहुत जो दूर से आते भरोसा क्या करें उन का
वे पाखी कुछ समय के बाद वापिस लौट जाते हैं
अँधेरा कब अच्छा उदासी ही वह देता
सुभ सूरज निकलता है कमल सब खिलखिलाते हैं
कभी देखा सुना न आज तक ऐसा किया क्या है
व्यथित की बात क्या ऐसी जिसे सब को बताते हैं
Wednesday, July 28, 2010
खेलों का समय नजदीक आ गया है लोग कह रहे हैं कि नक् जरूर कटेगी अय्यर साहब तो इस के लिए बाकायदा दुआ मांग रहे हैं इस पर मेरे कुछ मुक्तक प्रस्तुत हैं :-
खेलों में जो नाक कटेगी अब वो नाक बची ही कब है
नाक तो रोज रोज कटती है मंहगाई बढ़ जाती जब है
और नाक क्या तब न कटती आतंकी हमला होता जब
फिर भी नाक २ चिल्ला कर क्या यह नाक बचेगी अब है
केंद्र और सी बी आई
अपराधी को हीरो साबित करना कैसी मजबूरी है
उस के ही तो लिए देश की पूरी ख़ुफ़िया एजेंसी है
वैसे न तो ऐसे ही हम तुम से बदला ले ही लेंगे
सत्ता के भूखे स्यारों की ये नीयत कितनी खोटी है
मंहगाई पर
मंहगाई तो यार देश की उन्नति का ही पैमाना है
सरकारी इन अर्थ शास्त्रियों ने इसी बात को तो माना है
भूखे नंगे भीख म्न्गों को सस्ते कार्ड बनाये तो हैं
पर केवल वे ही भूखे हैं जिनको सरकारी माना है
जातिवादी जहर
जातिवाद पर फख्र करो अब ही तो अवसर आया है
संसद से सडकों तक इस का ही तो डंका बजवाया है
इसी लिए जाति गत गणना से अपनी बन आएगी
इस से ही तो सत्ता पाने का अवसर अब आया है
डॉ. वेद व्यथित
खेलों में जो नाक कटेगी अब वो नाक बची ही कब है
नाक तो रोज रोज कटती है मंहगाई बढ़ जाती जब है
और नाक क्या तब न कटती आतंकी हमला होता जब
फिर भी नाक २ चिल्ला कर क्या यह नाक बचेगी अब है
केंद्र और सी बी आई
अपराधी को हीरो साबित करना कैसी मजबूरी है
उस के ही तो लिए देश की पूरी ख़ुफ़िया एजेंसी है
वैसे न तो ऐसे ही हम तुम से बदला ले ही लेंगे
सत्ता के भूखे स्यारों की ये नीयत कितनी खोटी है
मंहगाई पर
मंहगाई तो यार देश की उन्नति का ही पैमाना है
सरकारी इन अर्थ शास्त्रियों ने इसी बात को तो माना है
भूखे नंगे भीख म्न्गों को सस्ते कार्ड बनाये तो हैं
पर केवल वे ही भूखे हैं जिनको सरकारी माना है
जातिवादी जहर
जातिवाद पर फख्र करो अब ही तो अवसर आया है
संसद से सडकों तक इस का ही तो डंका बजवाया है
इसी लिए जाति गत गणना से अपनी बन आएगी
इस से ही तो सत्ता पाने का अवसर अब आया है
डॉ. वेद व्यथित
Saturday, July 24, 2010
नव गीतिका
बहुत तन्हाईयाँ मुझ को भी तो अच्छी नही लगती
परन्तु क्या करूं मुझ को यही जीना सिखाती हैं
बहुत तन्हाइयों के दिन भुलाये भूलते कब हैं
वह तो खास दिन थे जिन्हों की याद आती है
यही तन्हाईयाँ तो आजकल मेरा सहारा हैं
सफर में जब भी चलता हूँ हई तो साथ जाती हैं
उन्होंने भूल कर के भी कभी आ कर नही पूछा
यह तन्हाईयाँ ही हाल मेरा पूछ जाती हैं
बहुत अच्छी हैं ये तन्हाईयाँ कैसे बुरा कह दूं
इन्ही तन्हाइयों में तुम्हारी याद आती है
यह तन्हाईयाँ मुझ से कभी भी दूर न जाएँ
इन्ही के सहारे मेरी भी किस्ती पार जाती है
इन्ही तन्हाइयों ने मुझ को बेपर्दा किया यूं है
बताता कुछ नही फिर भी पता सब चल ही जाती है
मोहब्बत मांग ली थी कुछ सुकून के वास्ते मैंने
उसी के साथ में तन्हाईयाँ खुद मिल ही जाती हैं
बहुत कीमत है इन तन्हाईयों की खर्च न करना
तिजोरी दिल को तो इन से हमेशा भरी जाती है
हमारे नाम के चर्चे जहाँ पर भी हुए होंगे
वहाँ पर खूब आंधी और तूफान भी हुए होंगे
तुम्हे कैसे कहूँ मैं मोम भी पाषाण होता है
इन्ही बातों से लोगों के जहन भी हिल गये होंगे
खबर है क्या तुम्हे वोप भूख को उपवास कहता है
खबर होती तो सिंघासन तुम्हारे हिल गये होंगे
महज अख़बार की कालिख बने हैं और वे क्या हैं
फखत शब्दों से कैसे पेट जनता के भरे होंगे
तुम्हारे चंद जुमले तैरते फिरते हवा में हैं
उन्हें कुछ पालतू मन्त्रों की भांति रट रहे होंगे
तुम्ही ने नाम करने को ही उस में बद मिलाया है
उसी खातिर ये ऐसे कारनामे खुद किये होंगे
उन्हें मैंने कहा कि आप भी मुख से जरा बोलेन
उसी से छल कपट के भेद सरे खुल रहे होंगे
यदि इन कारनामों को ही तुम सेवा बताते हो
तो निश्चित अर्थ सेवा के तुम्ही से गिर गये होंगे
परन्तु क्या करूं मुझ को यही जीना सिखाती हैं
बहुत तन्हाइयों के दिन भुलाये भूलते कब हैं
वह तो खास दिन थे जिन्हों की याद आती है
यही तन्हाईयाँ तो आजकल मेरा सहारा हैं
सफर में जब भी चलता हूँ हई तो साथ जाती हैं
उन्होंने भूल कर के भी कभी आ कर नही पूछा
यह तन्हाईयाँ ही हाल मेरा पूछ जाती हैं
बहुत अच्छी हैं ये तन्हाईयाँ कैसे बुरा कह दूं
इन्ही तन्हाइयों में तुम्हारी याद आती है
यह तन्हाईयाँ मुझ से कभी भी दूर न जाएँ
इन्ही के सहारे मेरी भी किस्ती पार जाती है
इन्ही तन्हाइयों ने मुझ को बेपर्दा किया यूं है
बताता कुछ नही फिर भी पता सब चल ही जाती है
मोहब्बत मांग ली थी कुछ सुकून के वास्ते मैंने
उसी के साथ में तन्हाईयाँ खुद मिल ही जाती हैं
बहुत कीमत है इन तन्हाईयों की खर्च न करना
तिजोरी दिल को तो इन से हमेशा भरी जाती है
हमारे नाम के चर्चे जहाँ पर भी हुए होंगे
वहाँ पर खूब आंधी और तूफान भी हुए होंगे
तुम्हे कैसे कहूँ मैं मोम भी पाषाण होता है
इन्ही बातों से लोगों के जहन भी हिल गये होंगे
खबर है क्या तुम्हे वोप भूख को उपवास कहता है
खबर होती तो सिंघासन तुम्हारे हिल गये होंगे
महज अख़बार की कालिख बने हैं और वे क्या हैं
फखत शब्दों से कैसे पेट जनता के भरे होंगे
तुम्हारे चंद जुमले तैरते फिरते हवा में हैं
उन्हें कुछ पालतू मन्त्रों की भांति रट रहे होंगे
तुम्ही ने नाम करने को ही उस में बद मिलाया है
उसी खातिर ये ऐसे कारनामे खुद किये होंगे
उन्हें मैंने कहा कि आप भी मुख से जरा बोलेन
उसी से छल कपट के भेद सरे खुल रहे होंगे
यदि इन कारनामों को ही तुम सेवा बताते हो
तो निश्चित अर्थ सेवा के तुम्ही से गिर गये होंगे
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