Sunday, September 21, 2014

जिंदगी  छू  लिया तो एक सिरहन सी हुई 
आँख भर देखा तो उस में एक तड़पन सी हुई 
बस  इसी के सहारे ये जिंदगी चलती रही 
और एक पल में इसी से जिंदगी पूरी हुई।  

जिंदगी अक्सर अक्सर हमारी पास रहती है कहाँ 
सोचते हैं, जिंदगी, पर दूर रहती है कहाँ 
हम इसी  भटकाव में जीते हैं अक्सर जिंदगी
 जिंदगी की मौज है  रहती कहाँ है जिंदगी। 

जिंदगी को देख लोगे तुम यदि नजदीक से 
तब समझ आ जाये शायद जिंदगी यह ठीक से 
पर इसे तुम फैंसला मत मान लेना आखिरी 
दूर रहती जिंदगी है जिंदगी की सिख  से। 
 

Thursday, March 20, 2014

वर्त्तमान माहौल पर कुछ कहने का प्रयत्न  है 

फिर से उड़ने लगे हैं झंडे फिर से नारे बाजी 
फिर से होने लगी है मिल कर वोट की सौदेबाजी 
कहीं बिकेगा  वोट नोट में और कहीं मनमानी   
जिस से किस्मत बन जायेगी कुछ लोगों की अच्छी।। 

महंगाई और भ्रष्ट  आचरण जैसे मुद्दे छोड़े 
जाय देश भाड़ में सब ने इस से नाते तोड़े 
हल हो जाये अपना मतलब बाकी नाते तोड़े   
क्या सारे सुख अमर शहीदों ने इस नाते  छोड़े।।

बनजाएगी पुन: वही  सरकार दुबारा वैसी 
जैसे जनता लुटी अभी तक और लुटेगी वैसी 
कौन कहे अब एक दूसरे से सब एक तरह  हैं 
लूटना तो जनता को है बस सब के सब ऐसे है।.

क्यों लुटती जनता इस का उत्तर आसान नही है 
कैसे मिटे गरीबी यह उत्तर आसान नही है 
जब तक होगी सौदेबाजी वोट बिकेगा यूं ही 
तब तक तो इस का उत्तर  इतना आसान नही है।.

काठ की हांड़ी कुछ ठेकेदारों की चढ़ जाती है 
पहन के खादी क्या पूछो बस उन की बन आती है 
वोट की खातिर गांधी जी का नाम खूब रटते हैं 
उस गांधी के  छपे नोट से ही मदिरा  आती है।.

राजनीति में आये थे तो चार रूपपली कब थी 
जनता की सेवा के बदले मेवा खूब हड़प ली 
अब तो बड़े आदमी हैं वे और बड़े हैं नेता 
प्रजातंत्र के राज तंत्र की कैसी कैसी करनी।।

बात यह उन लोगों की है जिन पर नही मजूरी 
फिर भी भारत  रोज रोज करता है नई तरक्की
पर  ये उन्नति कुछ हाथों तक सीमित हो जाती है 
जब की आधी आबादी ही भूखी सो जाती है।. 

दल कोई भी हो मैं दल का पैरोकार नही हूँ 
दल के दलदल से जो उपजा खरपतवार नही हूँ 
सच को कहना सच को लिखना मेरा धर्म रहेगा 
कलम बेच कर कुछ भी लिख दूं वो किरदार नही हूँ।।
डॉ वेद  व्यथित 
09868842688 

Saturday, March 15, 2014

होली इस बार कृषक बंधुओं के लिए दुखद रूप से आई है क्योंकि मौसम कि मार किसान कि फसल पर बुरी तरह पड़ी है उन्हें के दुःख को साँझा करे हुए उन्ही को समर्पित एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।  

मैं कैसे अबीर उड़ाऊँ 

खड़ी फसल पर ओले पड  गये 
सरे सपने उस में गल गये 
कान्हा जी भी हम से रूस गये 
कैसे बिटिया का ब्याह रचाऊं।   मैं कैसे .... 
कर्ज महाजन का है सर पे 
फसल बिना उतरे क्यों सर से 
निगाह बड़ी तिरछी है उस कि 
मैं कैसे कर्ज चुकाऊँ।  मैं कैसे .......
फसल काटने का अवसर था 
उमड़ घुमड़ बद्र सर पर था 
सोच सोच कर जी मिचली था 
चैट में कैसे मल्हार  सुनाऊँ।  मैं कैसे ……  
बूढ़े मैया बापू दोनों 
पड़े खाट टूटी पर दोनों 
पैसा नही है पास बचा अब 
मेंकैसे दवा दिलाऊं।  मैं कैसे ..........
बहन देखती बात भाई की 
भात  भरेगा ब्याह भांजी 
खाली हाथ बहन के घर पर 
कैसे भात ले जाऊं।  मैं कैसे ……
बेटा  पढ़ने की जिद करता 
भरी जवानी बूढा लगता 
फसल हुई बर्बाद असमय 
कैसे कालेज भिजवाऊं।  मैं कैसे … …
गोरी के जो गाल लाल थे 
पीले पड़  गये सब्जबाग थे 
ऐसे मैं उस के गलों पर 
कैसे गुलाल लगाऊं।  मैं कैसे ......
डॉ वेद व्यथित 
09868842688 . 

Monday, March 10, 2014

आज कल " आप " मौसम हुए 
क्या भरोसा है कब क्या हुए।  
बात ईमान से कह रहे 
क्योंकि वे ही हरिश चंद हए। 
दूसरों की हैं गंदी कमीजें 
साफ़ तो आप पहने हुए।  
देश में सब के सब चोर हैं 
कैसे लगते हैं कहते हुए।  
तोड़ दीं  तुमने कसमें सभी 
आप अपने सगे न हुए।  
जिन को मंचों से गालीं बकीं 
जीभ से उन के तलुए छुए।  
कथनी करनी कहाँ एक है 
अंतर दोनों में कितने हुए 
शर्म फिर भी कहाँ आप को 
जूते खा २ के खुश तुम हुए। 
शर्ट फाड़ी सभा के लिए 
हाथ में ब्लैक बेरी लिए 
कुर्सी मकसद रही "आप "का 
आदमी आम पीछे हुए।  
डॉ वेद व्यथित 

Friday, March 7, 2014


स्त्री यानि औरत

जिस की मजबूरी है 
घर की आमदनी  बढ़ाना  या 
आधुनिकता की दौड़ में शामिल होना 
इसी लिए निकलना पड़ता है उसे 
घर से सुबह सवेरे जल्दी ही 
सब की इच्छाएं पूरी करते हुए 
टिफिन , टाई  , रुमाल , जुराब और 
जरूरी चीजें संभलवा    कर 
फिर भागना पड़ता है उसे 
अपना नाश्ता छोड़ कर 
भीड़ भरे वाहनों में घुसने के लिए 
अपने खाली  से पर्स 
औ दूसरे  सामान के साथ 
साडी और साडी के पल्लू को सम्भालते २
आधुनिकता  और मजबूरी के बोझ को 
साथ २ ढोते  हुए ।
इसी तरह आती है वह शाम को 
सारा बोझ ढो कर 
जो और भारी  हो जाता है घर पहुँचते २ 
और उतरता भी नही है 
अन्य  सामान की तरह मन से
 घर आने पर भी 
अपितु और बढ़ जाता है वह 
दिन प्रति दिन यानि हर दिन 
दुगना हो कर ॥  

Tuesday, March 4, 2014

परमेश्वर कि अनुकपमा और मित्रों कि शुभकामनाओं के कारण मेरे काव्य संकलन " अंतर्मन " का सिक्किम में नेपाली भाषा में अनुवाद हुआ है। इस का अनुवाद मेरे मित्र  , नेपाली भाषा के सुकवि श्री अमर बानियाँ " लोहरो " ने  किया है तथा  डोगरी भाषा के प्रख्यात साहित्यकार डॉ सुवास  दीपक जी ने इस पुस्तक की भूमिका लिख कर उपकार किया है तथा आवरण पृष्ठ को संजोने और संवारने में  प्रसिद्ध चित्रकार दीपा राई जी ने अपना अमूल्य सहयोग दिया है।  
मैं बंधु अमर बानियाँ जी ,डॉ सुवास दीपक जी व दीपा जी के प्रति अपनी कृत्यज्ञता ज्ञापित करता हूँ और यह प्रसन्नता आप के साथ बांटने का सौभाग्य प्राप्त कर रहा हूँ।  इसे आप का स्नेह मिलेगा ही।  
डॉ वेद व्यथित 
09868842688   

Monday, February 24, 2014

प्यास
 
प्यास बहुत बलवती प्यास ने कितने ही सागर सोखे
प्यास  नही बुझ सकी प्यास बुझने के हैं सारे धोखे
प्यास यदि बुझ गई तो समझो आग भी खुद बुझ जाएगी
प्यास को समझो आग ,आग ही रही प्यास को है रोके ||
 
प्यास बुझी  तो सब कुछ अपने आप यहाँ बुझ आयेगा
यहाँ चमकती दुनिया में  केवल अँधियारा छाएगा
इसीलिए मैंने अपनी इस प्यास को बुझने से रोका 
प्यास बुझी तो  दिल भी अपनी धडकन रोक न आयेगा 
 
लगता है  प्यासों  को पानी पिला पिला कर क्या होगा 
पानी पीने से प्यासे की  प्यास का तो कुछ न होगा
प्यास कहाँ बुझ पाती  है बेशक  सारा सागर पी लो
सागर के पानी से प्यासी प्यास का तो  कुछ न होगा  
 
कितनी प्यास बुझा लोगे तुम बेशक कितने घट पी लो 
कितनी प्यास और उभरेगी बेशक इसे और जी लो 
जब तक प्यास को बिन पानी के  प्यासा ही न मारोगे
तब तक प्यास कहाँ बुझ सकती बेशक तुम कुछ भी पी लो 
आभार सहित
वेद व्यथित
अनुकम्पा -१५७७ सेक्टर ३ 
फरीदाबाद १२१००४ 

Friday, February 21, 2014

अँधेरे ही अँधेरे हैं उजाले छुप गये जा कर 
चलो हम रौशनी करने उन्हेंफिर ढूंढ लाते हैं |
तपिश जो बढ़ गई है आसमां से आग बरसी है 
चलो उस आग को हम खून दे कर बुझा आते हैं |
सुना है हर तरह वे अपनी बातें ही सही कहते 
चलो हम आइना उन का उन्ही को दिखा आते हैं |
नही वे मानते कब हैं कभी अपने किये को ही
उन्ही के कारनामों को उन्हें ही दिखा आते हैं |
बहुत आसन कब है खुद की गलती मान भर लेना
चलो उन की कही बातें उन्ही को बता आते हैं |
फुंके अपना ही घर बेशक उजाले तो जरूरी हैं
चलो हम दीया लेकर फूंक अपना घर ही आते हैं |

डॉ. वेद व्यथित
०९८६८८४२६८८

Saturday, February 8, 2014

आदरणीय जनों व मित्रों के सद्भाव के कारण यहाँ गुलाब पर कुछ और पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ सम्भवत: इन्हे भी ऐसा ही स्नेह व प्यार मिलेगा।  
ये रचनाएं मैंने लगभग बीस  वर्ष पूर्व लिखीं  थीं और यूं ही रख छोड़ीं थीं पता नही कैसे ये पन्ने फिर खुल गये हैं।  

कोमलता से बांटता अपनी गंध गुलाब 
भंवरों को भर अंजुरी उस ने दिया प्राग 
सब कुछ तो उस ने दिया अपना मन और देह 
फिर वह क्यों तोडा  झटक यह था कैसा नेह। 

कोमलता उस की हुई उस को ही अभिशाप
काँटों से बचता हुआ पहुंचा उस के पास
 बेरहमी से तोड़ कर लिया हाथ में भींच 
शिकवा अब किस से करे कैदी बना गुलाब। 

जिस दिन से खिलने लगा छूने लग गई धूप 
मेरा खिलना लाजमी धुप भी थी मजबूर 
कुछ दिन  तो उस ने सहा उस का मीठा ताप  
पर कितने दिन झेलता धुप की तीखी आग।  

मन की बगिया में खिला एक गुलाबी फूल 
यह क्या सचमुच फूल था या थी केवल भूल 
भूल हुई तो क्या हुआ उपजा तो है फूल 
कभी कभी यह भूल भी बन जाती है फूल। 

ऐसा क्या मैंने कहा मुरझा गया गुलाब 
बिन समझे ही रूठ कर हुआ वह बेहाल 
फिर भी इस के हाल पर मुझ को रहा मलाल 
मैं तो फिर भी धुप था वह था निपट गुलाब।
डॉ वेद व्यथित 
०९८६८८४२६८८ 
बाद में अभी गुलाब से आप का संवाद और करवाऊंगा   

Thursday, January 2, 2014

प्यारी पीड़ा

प्यारी पीड़ा 

पीड़ा इतनी प्यारी क्यों है 
हृदय सीप  में मोती जैसी 
यह इतनी उजयारी क्यों है ? 

जो जो भूल हुईं जीवन में 
भूला कब हूँ याद  सभी हैं 
एक एक कर सभी सामने 
हर दिन खुद आ जाती क्यों हैं 
बहुत चाहता भूलूं उन को 
पर वे भूलें प्यारी क्यों हैं ?

जिन रस्तों पर खूब चला हूँ 
उन से ही क्यों ऊब रहा हूँ 
नई  राह की  चाह लिए क्यों
 मंजिल मंजिल भटक रहा 
नई नई मंजिल अनजानी  
लगती इतनी प्यारी क्यों हैं ?

गहन तिमिर की स्याह निशा में 
आँखों की कोशिश रहती हैं 
अंधकार के चित्र बना कर  
छूने की कोशिश रहती है
 हवा गुजरती यदि निकट से 
आखों को दिख जाती क्यों है ?

बैठे बैठे गहन शून्य में 
कितने रंग भरे सपनों में 
गहन तमस  में आँखें कैसे 
रंग सजाती  है सपनों में 
बिना बात सपनों की माला 
आँखें रोज सजातीं क्यों हैं ??

डॉ वेद व्यथित 
अनुकम्पा -१५७७ सेक्टर - ३ 
फरीदाबाद -१२१००४ 
09868842688 

Wednesday, December 11, 2013

फ़िरदौस ख़ान ने किया वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद.

यह उर्दू जगत की महान पत्रकार शख्शियत मेरी बहन फिदौस खान कि रचना है यह उन का अद्वितीय कार्य है उन्हें साधू वाद देता हूँ

फ़िरदौस ख़ान ने किया वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद... 
-सरफ़राज़ ख़ान
लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी के नाम से जानी जाने वाली स्टार न्यूज़ एजेंसी की संपादक फ़िरदौस एवं युवा पत्रकार फ़िरदौस ख़ान ने वंदे मातरम का पंजाबी में अनुवाद किया है. वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है. इसकी रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने की थी. अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और वरिष्ठ साहित्यकार मदनलाल वर्मा क्रांत ने वंदे हिन्दी में अनुवाद किया था. भाजपा नेता आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया. गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला में हैं. राष्ट्रकवि रबींद्रनाथ ठाकुर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया था. भारत में पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है. इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा कर इसकी धुन और गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है, जो 52 सेकेंड है. 

वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ 
ਤੂੰ ਭਰੀ ਹੈ ਮਿੱਠੇ ਪਾਣੀ ਨਾਲ਼
ਫਲ ਫੁੱਲਾਂ ਦੀ ਮਹਿਕ ਸੁਹਾਣੀ ਨਾਲ਼
ਦੱਖਣ ਦੀਆਂ ਸਰਦ ਹਵਾਵਾਂ ਨਾਲ਼ 
ਫ਼ਸਲਾਂ ਦੀਆਂ ਸੋਹਣੀਆਂ ਫ਼ਿਜ਼ਾਵਾਂ ਨਾਲ਼ 
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ… 

ਤੇਰੀਆਂ ਰਾਤਾਂ ਚਾਨਣ ਭਰੀਆਂ ਨੇ
ਤੇਰੀ ਰੌਣਕ ਪੈਲ਼ੀਆਂ ਹਰੀਆਂ ਨੇ
ਤੇਰਾ ਪਿਆਰ ਭਿੱਜਿਆ ਹਾਸਾ ਹੈ
ਤੇਰੀ ਬੋਲੀ ਜਿਵੇਂ ਪਤਾਸ਼ਾ ਹੈ
ਤੇਰੀ ਗੋਦ 'ਚ ਮੇਰਾ ਦਿਲਾਸਾ ਹੈ
ਤੇਰੇ ਪੈਰੀਂ ਸੁਰਗ ਦਾ ਵਾਸਾ ਹੈ
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ… 
-ਫ਼ਿਰਦੌਸ ਖ਼ਾਨ   

मातरम का पंजाबी अनुवाद (देवनागरी में)
मां तैनूं सलाम
तूं भरी है मिठ्ठे पाणी नाल
फल फुल्लां दी महिक सुहाणी नाल
दक्खण दीआं सरद हवावां नाल
फ़सलां दीआं सोहणिआं फ़िज़ावां नाल
मां तैनूं सलाम…

तेरीआं रातां चानण भरीआं ने
तेरी रौणक पैलीआं हरीआं ने
तेरा पिआर भिजिआ हासा है
तेरी बोली जिवें पताशा है
तेरी गोद ’च मेरा दिलासा है
तरी पैरीं सुरग दा वासा है
मां तैनूं सलाम…
-फ़िरदौस ख़ान

वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद (रोमन में)
Ma tainu salam
Tu bhri hain mithe pani naal
Phal phulaan di mahik suhaani naal
Dakhan dian sard hawawaan naal
Faslan dian sonia fizawan naal
Ma tainu salam...

Tarian raatan chanan bharian ne
Teri raunak faslan harian ne
Tera pyaar bhijia hasa hai
Teri boli jiven patasha hai
Teri god 'ch mera dilaasa hai
Tere pairin surg da vasa hai
Ma tainu salam...
-Firdaus Khan

फ़िरदौस ख़ान पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं. वह कई भाषाओं की जानकार हैं. उन्होंने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में कई साल तक सेवाएं दीं. उन्होंने अनेक साप्ताहिक समाचार-पत्रों का सम्पादन भी किया. ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर उनके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है. उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है. वह देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और समाचार व फीचर्स एजेंसी के लिए लिखती रही हैं. प्रभात प्रकाशन समूह से उनकी 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नाम से एक किताब भी प्रकाशित हो चुकी है.  इसके अलावा वह डिस्कवरी चैनल सहित अन्य टेलीविज़न चैनलों के लिए स्क्रिप्ट लेखन भी करती हैं. उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल संपादन और लेखन के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है. इसके अलावा कवि सम्मेलनों और मुशायरों में भी वह शिरकत करती रही हैं. कई बरसों तक उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम भी ली. उर्दू, पंजाबी, अंग्रेज़ी और रशियन अदब (साहित्य) में उनकी ख़ास दिलचस्पी है. वह मासिक पैग़ामे-मादरे-वतन की भी संपादक रही हैं. फ़िलहाल वह स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं. 'स्टार न्यूज़ एजेंसी' और 'स्टार वेब मीडिया' नाम से उनके दो न्यूज़ पॊर्टल भी हैं.

Monday, May 20, 2013

नव गीतिका



नव गीतिका 
यह रचना गजल नही है 
रौशनी कैद है और परेशान  है 
अब जमाने की ये ही तो पहचान है । 
हाँ मैं हाँ बस  करो और कुछ न कहो 
फिर तो सब से  भले आप  इन्सान हैं। 
भूल कर भी उठाया यदि प्रश्न तो 
आप इन्सान कब आप हैवान हैं । 
भूल जाओ यहाँ सच बड़ी चीज है 
संच कहने से मिलता नही मान है ।
आँख भी बंद हो , कान मुंह बंद हो 
फिर तो बन जाओगे आप परधान है। 
झूठ ही तुम कहो जोर से पर कहो 
मान लेंगे उसे लोग सच बात है ।
इस जमाने का कैसा ये दस्तूर है 
पूजते हैं उसे जो की बदमाश है । 
आप बच्चों के जैसे न बातें करें 
जिस से पूरा हो स्वारथ वो भगवान है । 
इस जमाने से कैसे लड़ोगे भला 
सांच अब न यहाँ  कोई हथियार है ।।   
डॉ वेद व्यथित 
09868842688 

Wednesday, April 10, 2013

शुभकामनायें

सभी मित्रों को शत्रुओं को अपनों को परायों को भारतीय नव वर्ष २ ० ७ ० की मेरी हार्दिक शुभकामनायें हैं । कृपया स्वीकार कर  के अनुग्रहित करें । 
ईश्वर इस वर्ष में आप को सभी सफलताएं प्रदान करें । आप की सत  मनोकामनाएं पूर्ण हों । आप के श्तुओं का विनाश हो । आप हर प्रकार से सुखी हों । 
डॉ वेद व्यथित 
09868842688 

Tuesday, March 26, 2013

होलिका उत्सव की मैं सभी मित्रों को शुभकामनायें प्रदान करता हूँ । साथ ही भक्त प्रहलाद के सत्याग्रह का स्मरण भी करवान चाहता हूँ की किस प्रकार असत्य से छोटे से बालक ने संघर्ष किया वह  अनुकरणीय है ईश्वर स्मरण ही होलिका उत्सव का मुख्य उद्देश्य और महातम है परन्तु आज केवल बुराइयां ही उत्सव मनाने का केंद्र बिंदु बन गईं हिं क्या यही उत्सव की पवित्रिता  है नही है इस से यह पवन पर्व अपावन हो जायेगा इस लिए पवन पर्व को हम पावन रीति से सम्पन्न करने ।
 शुभकामनायों सहित 
वेद व्यथित 

'हम कलम ' साहित्यिक  व् सांस्कृतिक संस्था की इस मास की  गोष्ठी होलीका पर्व को समर्पित रही । होलिका  उत्सव के उल्लास में डॉ  मृदुला सिन्हा ने बिहार के लोक जीवन में रचे बसे लोक  गीत ' फागुन में बुढवा  देवर लगे ' गुनगुना कर वातावरण को उल्लसित कर  दिया । डॉ वेद  प्रताप वैदिक ने इस अवसर पर सभी उपस्थित साहित्यकारों को अपनी शुभकामनायें प्रदान की । डॉ रमा सिंह ने होली के गीत सुना  कर सब को भाव विभोर कर दिया । व्यंगकार निशा भार्गव  ने अपने चिर परिचित अंदाज में व्यंग पढ़े । डॉ वेद  व्यथित ने रीतिकाल और उत्तर आधुनिक कल के माध्यम से अपना व्यंग प्रस्तुत किया । डॉ सुनीति रावत ,डॉ अमरनाथ अमर ,क्रांति वत्स 'डॉ रश्मि मल्होत्रा डॉ अर्चना त्रिपाठी डॉ  प्रभा किरन  जैन , प्रतिभा जौहरी जनक  सचदेव प्रवेश धवन  आभा कुल श्रेठ  प्रवेश धवन     आदि की  गोष्ठी में सार्थक  उपस्थिति रही  । डॉ संतोष गोयल  गोष्ठी का सफल संचालन किया  । 
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Wednesday, December 5, 2012

महा अभियोग 

उस पर निरापराध होने का 
अभियोग लगा 
पुलिस ने तफ्शीश शुरू की 
बहुत साक्ष्य जुटाए गये 
उस का टूटा मकान 
व न  कोई वाहन  न अवैध हथियार 
न कोई कीमती सामान 
जमानत के लायक भी 
भी नही थे कागजात 
और उस ने कर लिया था 
जुर्म का इक़बाल 
अब मुकद्दमा शुरू हुआ 
तारीख पर तारीख 
शुरू हुई 
गवाह पेश हुए 
सभी ने उस के
 निरापराध होने की गवाही दी 
एक दो गवाहों  ने
 मुकरने की कोशिश भी की 
परन्तु बात नही बनी 
आखिर उस पर अभियोग सिद्ध हुआ 
निर्णय स्थगित भी नही हुआ 
तुरंत सुना दिया गया 
सच्चाई की लड़ाई के लिए 
उसे काले पानी की सजा हुई 
लोगों ने फब्तियां कसीं 
-बड़ा बन रहा था 
ईमानदार की दुम 
ले लिया फल 
अब पता चल जायेगा 
जब जेल में जिन्दगी बिताएगा 
ईमानदारी का पूरा फल पायेगा ।।

Friday, November 9, 2012


 ॐ

तमसो माँ ज्योतिर्गमय 
भारतीय संस्कृति की उद्घोषणा तम  से प्रकाश की और बढ़ें  ,के साथ
आओ मिल कर प्रकाश पर्व मनाएं 
इस शुभ अवसर पर
आप को सपरिवार हार्दिक शुभकामनायें प्रदान 
करता हूँ 
कृपया स्वीकार करें 

मन दीप सजाया है 
दीवाली आई है 
खुशियों का उजाला है ।

दीपों का उत्सव है 
तुम्हें खुशियाँ  खूब मिलें 
मेरा ऐसा मन है ।

मन दीपक हो जाये 
अंधियारे दूर रहें 
उजियारा हो जाये ।

मन दीपक हो जाये 
खुशियों से भरे झोली 
सब खुशियाँ मिल जाएँ ।
निवेदक 
डॉ वेद व्यथित 
अनुकम्पा - 1577 सेक्टर 3 
फरीदाबाद 
09868842688

Saturday, October 20, 2012


रिज्युमे 
दाढ़ी वाले लम्बे तगड़े दो युवक मेरे मित्र भाई भरोसे लाल की दुकान पर आये । उन्होंने आते ही भाई भरोसे लाल से कहा कि 'अंकल हमे नौकरी के लिए चिठ्ठी लिखवानी है । मैं और मेरा मित्र भरोसे लाल उन की नौकरी के लिए चिठ्ठी को नही समझ सके । हम ने एक दुसरे की और देखा और वे दोनों भी समझ गये की हम मूर्ख  हैं हमारी समझ में ये भी नही आया की कहीं  भी नौकरी के लिए चिठ्ठी भेजनी पडती है भाई भरोसे लाल ने पूछा कि आप को किसी के लिए सिफारिशी चिठ्ठी लिखवानी है क्या ? बे बोले - अरे यार  अंकल नही वः चिठ्ठी जो नौकरी लगने  के लिए देनी पडती है दरखास्त । अच्छा भाई भरोसे लाल समझ गये कि ये अपना रिज्युमे  यानि विवरण बनवाना चाहते हैं परन्तु अंग्रेजी कम्पनियां विवरण कहाँ समझती हैं उन के लिए तो फ्रेंच का रिज्युमे ही चाहिए ।
भाई भरोसे लाल ने पूछा रिज्यूम बनवाना है क्या ? अब उन दोनों युवकों ने एक दुसरे की और देखा की यह रिज्यूम क्या है ? तब भाई भरोसे लाल ने बताया की नौकरी के लिए दी जाने वाली दरख्वास्त को ही भाई अब रिज्यूम कहते हैं ।तब उन्होंने कहा कि चलो तो व्ही बना दो पर बनाना बढिया सा जिस से बढिया सी नौकरी लग जाये क्यों अब हमे पुलिस ज्यादा ही तंग करने लगी है जब मर्जी आये बुलवा लेती है नौकरी लग जाएगी तो ठीक रहेगा । भरोसे लाल ने कहा कि अभी  बना देता हूँ साथ रूपये लगेंगे । तब वे बोले लाला जी आप रुपयों की चिंता मत करो साथ ही दे देंगे पर बनाना बढिया सा पर वैसे हम से कोई पैसे मांगता नही है । उन में से एक ने अपनी टी शर्ट थोड़ी सी उपर करते हुए पेंट में घुसा हुआ देसी कट्टा यानि पिस्तौल की और इशारा करते हुए कहा । भाई भरोसे लाल समझ गया की ये निश्चित ही गुंडा तत्व हैं । अब तो फंस ही गये हैं । हे भगवान जैसे तैसे शांति से निपट जाएँ बीएस । बेशक पुलिस पास ही क्यों न खड़ी हो पर वः भी इन का क्या कर  लेगी । वह  भी गुंडों से आसानी से नही उलझती है । वः तो केवल शरीफ आदमियों को तंग करने के लिए है ।
आखिर भाई भरोसे लाल चुप चाप उन का रिज्यूम बनाने में जुट गये वे बोले -  अपना नाम बताओ ?भरोसे लाल ने सहजता से पूछा तो उन दोनों ने एक दुसरे  की और देखा भरोसे लाल की उँगलियाँ कम्पुटर के की  बोर्ड पर रुक गईं  उन्होंने फिर पूछा कि भाई क्या नाम लिखूं ?
उस लडके ने कहा - उं उं ...कौन सा नाम लिखवाऊं ?
- अरे भाई नाम के है तुम्हारा ?
- अरे अंकल जी एक हो तो बताऊँ , अलग 2 शहरों की पुलिस में अलग 2 नाम दर्ज हैं या अपना गाँव वाला नाम ही बता दूं ?
अरे भाई जो मन करे वही  बता दो ।
- तो सोनू लिख  दो ।
- आगे क्या लिखूं ?
- ये आगे पीछे क्या होता है आगे पीछे कोई हो तो बताऊँ बस  सोनू लिख दो ।
- ठीक है पिता जी  का नाम बताओ ?
- पिता जी मतलब बाप का नाम बताऊं ?
 -हाँ भाई  बाप का नाम बताओ ?
 -लिखदो मेहर ।
 -भाई मेहर खान लिखूं या सिंह ?
-जो मर्जी आये लिख दो खां और सिंह से क्या फर्क पड़ता है रहेंगे तो हम हम ही वही  दस नम्बरी ।
- घर का पता बताओ ?
- इसे खाली  छोड़ दो जहाँ दरखास्त देंगे वही  का भर देंगे ।
- पढ़ाई  बताओ क्या 2 पास किया है ?
- अरे अंकल पास तो हम बहुत  कुछ हैं जेब काटने से ले कर  चोरी डैकेती अपहरण हत्या सब में पास हैं ।
- अरे भाई कोई स्कूल की पढाई  बताओ ?
-अंकल पढाई  कहाँ कर  पाए हैं पढाई  करते तो ये काम  ही क्यों  करते पढाई कर  लेते तो बड़े 2 घोटाले आराम से करते रहते पुलिस पीछे क्यों पड़ी रहती उल्टा हमे ही सलाम  मरती बस  अंग्रेजी  ही तो नही आती गिनती तो हम ने चौथी में ही सिख ली थी पर इस में दसवीं पास लिख दो क्यों भाई ठीक है न ?
उस ने अपने दोस्त की और मुखातिब होते हुए कहा तब दूसरा  यानि उस का दोस्त बोला 
- पर  तेरे पास तो पांचवीं पास का भी सटीटिकट (सर्टीफिकेट )नही है ।
ले तू भी है खूब सटीटिकट का क्या है तू बता जितनी पास का कहे बनवा दूंगा याद  है न जेल में वह  पतला सा आदमी मिला  था न वह  यही कम तो करता है पास करवा कर  लोगों को पढ़े लिखे बनवाने का उस से ही बनवा लेंगे दसवीं पास का सटीटिकट और वो तो हम से पैसे भी नही लेगा अपनी ही लाइन  का आदमी है ।
अंकल लिख दो दसवीं पास ।
- ठीक है लिख दिया ।अब बताओ  कौन 2 सी भाषाएँ  जानते हो ?
- भाषा ?
 -अरे भाई बोलियाँ   कितनी जानते हो ?
- सब जानते हैं जहाँ चले जाएँ वहीं  की बोल लेते हैं परन्तु पुलिस की बोली तो हम खूब समझते हैं और पुलिस भी हमारी बोली खूब जानती है ।
- अरे भाई हिंदी अंग्रेजी पंजाबी ऐसी बोली बताओ ।
- अंकल बताया न आप कप अंग्रेजी अति तो यहीं आते आप के पास अंग्रेजी आती तो नेता हमे दिन में ही अपने पास बुलवाया करते पर अंग्रेजी नही आती इस लिए रत में बुलाते हैं अपने काम करवाने के लिए हिंदी लिख  दो ।
- ठीक है एक्सपीरियंस बताओ ?
 -इस का मतलब ?
 -इस का मतलब है आप का क्या 2 अनुभव है ।
- अंकल अनुभव तो हमे हर चीज का है दुनिया का कोई ऐसा ताला  नही है जिसे हम खोल या तोड़ न सकें कोई गाड़ी ऐसी नही है जिसे हम खोल न लें डैकेती अपहरण आदि तो हमारे बाएं हाथ के खेल हैं ये सब अनुभव हैं ।
ये सब सुन क्र भाई भरोसे लाल बोले -भाई तुम तो बहुत महान हो तुम्हारी आवश्यकता तो पुलिस में बहुत  ठीक रहेगी तुम तो थानेदार बनने के के लिए दरखास्त दो पर कुछ और अनुभव भी बताओ ? ये तो दो पन्ने भी नही भरे ।
- अरे अंकल और अनुभव तो हमारे बहुत सारे  हैं कई 2 राज्यों की पुलिस हमारे पीछे पड़ी रहती है हमे तो हर राज्य में डैकेती का अनुभव है और ज्यादा करो तो लिख दो हमारे फोन से ही लोग हमे चुपचाप रंगदारी भेज देते हैं हम चाहे  जेल में हों या बाहर हों और आस पास की पुलिस तो हमे छेड़ने की हिम्मत  भी नही करती है वे तो बाहर की पुलिस के साथ मजबूरी में ही आते हैं और उस का भी हमे पहले ही पता चल जाता है ।
- इस में कितने पैसे तनखाह के लिखूं की कितने पर कम करोगे ?
- यह तो हम पार्टी देख कर तय  कर लेंगे कि कितने दे सकता है ?उस का दफ्तर व् गाड़ियाँ आदि देख कर  पता चल जाता है ।
- भाई और कुछ लिखना है क्या ?
अंकल यह भी लिख दो की नौकरी नही दी तो फिर देख लेना हम कौन हैं ?
आखिर जैसे तैसे भाई भरोसे लाल ने उन का विवरण यानि रिज्यूम बनया और उन के हाथ में थमा दिया बिना पैसे मांगे ही ।परन्तु फिर भी उन्होंने सौ का करार सा नोट निकल कर भाई भरोसे लाल के हाथ में थमा दिया भाई भरोसे लाल बोले की भाई दस बीस जो खुले हो वही  दे दो मेरे पास खुले पैसे नही हैं तब वः बोला - अरे अंकल आप भी कैसी बात करते हो हम भी तो आप के बच्चे हैं आप इस में से भी क्या वापिस देंगे इसे रखो अपने पास इस में से भी क्या वापिस दोगे  । तब भाई भरोसे लाल बोले की भाई बच्चे ही हो तो फिर तुम से क्या लेना तुम ही रख लो ।भरोसे लाल ने सोचा की कहीं सौ के पांच  सौ न मांगने लगें इन का क्या है तब दोनों बोले नही अंकल जी रहने दो कम हों तो बताओ और दें और वे उस रिज्यूम को ले कर वहन से चलते बने ।
उन के जाने  के बाद भाई भरोसे लाल ने उन का दिया हुआ सौ का करार नोट ध्यान से देखा उस में गाँधी जी तो थे पर उन का चश्मा गायब था यानि सौ का नोट एक दम  सौ प्रतिशत नकली था जिन से उन की जेब भरी हुई थी जिन में पांच सौ के नोट ही ज्यादा थे परन्तु फिर भी गनीमत रही कि वे गल्ले के पैसे छीन कर नही ले गये व बदतमीजी नहीकी ये क्या कम है नही तो गला पकड़ते और सारे पैसे भी छीन ले जाते बेचार  बड़े भले थे एक दम शरीफ व बड़े आदमियों के जैसे ।
भरोसे लाल के हाथ में वही  करार सा नोट था कभी वह  उसे देखता और कभी कम्प्यूटर में दिख रही अपनी  मुरझाई शक्ल को पर वह अब इस नोट का क्या करे पुलिस को दे या फाड़ कर फैंक दे इसे ले कर यदि वह पुलिस के पास गया तो पुलिस उसे ही वहीं  बैठा लेगी और नकली मुद्रा के कानून में फंसा देगी या उलटे उसे ही और पैसे देने पड़  जायेंगे पर पुलिस को न बताना भी तो अपराध है भरोसे लाल के माथे पर पसीना आ गया कि  वह अब क्या करे क्यों की वह भी तो एक शरीफ व् इज्जतदार इन्सान है ।
डॉ वेद व्यथित 
अनुकम्पा - 1577 सेक्टर -3 
फरीदाबाद 121004 
09868842688 

Friday, August 24, 2012


सामने देखो 
पहले समय में कुछ काम ऐसे होते थे जिन को सिखने के लिए बाकायदा कोई कोर्स करने की जरूरत नही पडती थी जैसे आप बचपन में ही घर वालों को बिना बताये ही चोरी छुपे साईकिल चलाना सीख लेते थे | उस के लिए आप को किसी स्कूल में ट्रेनिग लेने  की जरूरत नही पडती थी वैसे ही फोटो ग्राफी भी ऐसे ही ऐसे ही आ जाती थी और फिर एक कैमर खरीद कर मोहल्ले में ही फोटो ग्राफी कि दुकान शुरू हो जाती है थी |
इसी तरह की फोटो ग्राफी की दुकान मेरे मित्र भाई भरोसे लाल के पडोस में भी खुल गई | भाई भरोसे लाला का पड़ोसी होने के नाते फोटो ग्राफर उन्हें रोज इस लिए भी राम २ करता था कि कभी तो ये भी फोटो ग्राफी का काम करवाएंगे ही या किसी और से सिफारिश  कर के काम दिलवाएंगे और  कभी २ तो वह कह भी देता कि ताऊ जी मेरा भी ख्याल रखना | भाई भरोसे लाल भी चाहता था कि इस बेरोजगार युवक का किसी तरह रोजगार चल निकले | इसी लिए भाई भाई बरोसे लाल ने अपने घर पर अपने पोते का जन्म दिन मनवाया कि चलो इस बहाने  उस फोटो ग्राफर को भी काम मिल जायेगा |
पार्टी शाम को रखी गई | भाई भरोसे  लाल ने फोटो ग्राफर को कई दिन पहले ही बता दिया कि रविवार की शाम को पार्टी होनी है और  तुम फोटो खींच देना साथ ही यह भी  कहा  कि देखो फोटो बहुत बढिया खींचना , खराब न हो जाएँ | सब घरवाले तो मना कर रहे हैं किसी और से फोटो खिंचवायेंगे पर  मैंने उन से जिद्द कर के तुम से ही फोटो खिंचवाने का फैंसला किया है | साथ ही उन्होंने एक बात और कही कि समय पर अपने आप पहुंच जाना उस दिन तुम्हे ढूंढना न पड़े |फोटो ग्राफर ने भाई भरोसे लाल से पहले भी कई बार की गई अपनी बड़ाई  को दोहराया और दोनों बातों के प्रति आश्वस्त किया कि आप चिंता मत करो बहुत बढिया फोटो बनाऊंगा और अपने आप समय पर पहुंच जाऊंगा  आप बिलकुल भी चिंता न करें | यह तो मेरे घर का ही काम समझो | भाई भरोसे लाल उस की बातों से खूब आश्वस्त हो गये |
पार्टी का दिन आ ही गया | भाई भरोसे लाल सुबह ही जा कर देख आये की उस की दुकान खुली या नही | फोटो ग्राफर उन्हें दूर से दूर से ही सफाई करता दिख गया तो भरोसे लाल को तसल्ली हो गई कि फोटो ग्राफर आ गया है परन्तु उन्होंने फिर भी उस की दुकान पर जा कर उसे याद दिला दिया ही कि भाई शाम को कहीं चले मत जाना समयपर पहुंच जाना | उस ने फिर वही वाक्य दोहराए कि आप चिंता मत करो | धीरे २ शाम होने शाम होने लगी और पार्टी का समय भी आ ही गया |
यह कस्बे की जन्म दिन यानि बर्थ दे पार्टी थी यहाँ वैसे तो ज्यादातर लोग   बच्चे के जन्म  दिन पर कथा कीर्तन करवा कर सब को प्रसाद बंटवा  देते थे  |उस समय न उपहार का आदान  प्रदान और न ही मोमबत्ती  बुझाते हुए थूक के कण पड़े केक का वितरण ही होता था और कई बार तो नासमझी  में प्रसाद समझ  कर जो लोग शाकाहारी होते हैं उन्हें भी अंडे का केक खाना पड़ जाता था |
घर में चहल पहल  होनी शुरू हो गई | जिन के केवल बच्चे ही बुलाये गये थे उन की मम्मियां भी साथ आ गईं कई अपने छोटे भाई बहनों  को भी साथ ले आये कि वहाँ कागज की टोपी व टॉफी मिलेगी | बच्चो ने चिल्ल  पौं मचा कर धमाल मचाना शुरू कर दिया  भरोसे लाल ने कई बार घड़ी देखी और फिर दरवाजे की ओर देखा सोचा चलो एक आधा घंटा तो लेट चल ही जाता है आ जायेगा परन्तु पूरे दो घंटे हो गये फोटो ग्राफर अभी दूर २ तक भी  दिखाई नही दे रहा था कुछ छोटे बच्चे ज्यादा समय हो जाने   के कारण रोने लगे उन्हें चुप करवाना टेढ़ी खीर थी क्यों की लग रहा था कि ये टॉफी व टोपी अभी क्यों नही मिल रहा कुछ को शू २ आने लगा कुछ बार २ पानी मांगने लगे और जो औरतें बच्चो के साथ आ गईं थी वे खाने पर आमंत्रित नही थी अत: उन्हें घर जा कर खाना  बनाना था उन के लिए देर हो रही थी क्यों कि उन के पति देव घर पहुंच चुके थे और वे उन्हें घर वापिस आने का संदेशा भी भिजवा चुके थे |
इस भीच भाई भरोसे लाल कई बार बच्चो से फोटो ग्राफर को उस  की दुकान पर दिखवा चुके थे पर वह तो दुकान पर ही नही था | अब क्या किया जाये आखिर इंतजार कर के केक काट  ही लिया गया बिना फोटो खींचे ही |जैसे ही केक  कटा  इतने में ही फोटो ग्राफर भी आ गया भरोसे लाल को गुस्सा तो बहुत आ रहा था पर पार्टी के कारण उस गुस्से को दबा गया | फोटो ग्राफर ने तुरंत कैमरा निकल कर फ्लेश मारनी शुरू कर दी फोटो ग्राफर अपने एक्शन में आ गया और बाक़ी सध गये यानि अलर्ट हो गये महिलाओं ने रोते बच्चों की आँख और टपकती नाक फटाफट अपनी २ साड़ी के पल्लू से साफ की कुछ छोटे बच्चों  व बड़ों ने भी अपने बाल उन्गलियां  फेर कर ही संवार  लिए कुछ ने अपने कालर  आदि को कंधों को झटका दे २ कर ठीक कर लिया अब फोटो ग्राफर ने भरोसे लाल को कहा  आप चाकू पकड़ो और केक पर लगाओ तभी किसी ने कहा केक तो कट चुका है तब फोटो ग्राफर ने समझाया कोई बात नही केक का फोटो तो होना चाहिए हाँ जी केक पर चाकू रखो भरोसे  लाल ने पोते के हाथ में दे कर दुबारा कटवाने का अभिनय किया अब बारी आई केक खाने और खिलने की तो सब से पहले जिस का जन्म दिन था केक भी उसी को पहले खिलाया जाना चाहिए इस लिए भाई भरोसे लाल ने केक का बड़ा सा टुकड़ा उठा कर पोते के मुंह की तरफ किया तुंरत फोटो ग्राफर ने कहा - ताऊ जी समाने देखो भाई भरोसे लाल सामने देख कर पोते को केक खिलने लगा अब भला आप देखो किधर और हाथ किधर हो तो वह बिना देखे कैसे सही जगह पर जा सकता है | इसी चक्कर में केक बच्चे के मुंह के बजाय नाक में चला गया बच्चा रोने लगा अब भला रोते हुए बच्चे का फोटो कैसे खिंचा जाये तो जैसे तैसे बच्चे को चुप करवाया गया तो बच्चे की माँ केक खिलने लगी फोटोग्राफर ने उसे भी समाने देखने का आदेश दिया तो और भी गडबड हो गई एक तो उस ने जैसे तैसे थोडा सा घुंघट उठाया ताकि बादलों से ही  सही कम से कम चाँद दिखे तो  पर ससुर जी भी वहीं खड़े थे तो और फोटो ग्राफर का आदेश तह सामने देखो तो इस बार बच्चे के मुंह में जाने के बजाय पोते को गोद में उठाये भरोसे  लाल की मूछों  से जा टकराया  परन्तु फोटो ग्राफर  फिर भी सब को सामने देखो कहने से बाज  नही आया |
इसी तरह इस फोटो ग्राफर की सामने देखने की बात ने एक बार बड़ी गडबड कर दी होती | उस के पास देहात में एक शादी की फ्रोतो ग्राफी करने का काम मिला देहात में तो कैर देख कर वैसे ही लोग इकठ्ठे हो जाते हैं और शादी में तो वैसे भी भीड़ भाड़ थी और देहात में जब खेत बिक जाएँ तो कुछ दिन तक तो किसान बहुत पैसे वाला हो जाते है इसी लिए फोटो ग्राफर लडके वालों की मर्जी से जबरदस्ती बुलवाया गया |दुल्हन को तो शादी में वैसे ही जबर दस्ती शरमाना  होता ही है |वर वधू का माल्या अर्पण  यानि  जय माला का कार्य कर्म शुरू हो गया फोटो ग्राफर बार २ रट लगा रहा था - सामने देखो सामने देखो | दूल्हा अपनी अकड में था विवाह मंच पर दूल्हे के हुड़दंगी  दोस्त भी बरती होने के नाते बर्राए हुए और बोराए हुए  थे | दुल्हन में दूल्हे को  माला पहनाने के लिए हाथ उठा कर जैसे ही आगे बढाये वैसे ही फोटो ग्राफर ने खा  सामने देखो और इतने ही बगल से दोस्तों का एक धक्का दूल्हा को लगा दूल्हा अपनी जगह से खिसक गया उस की जगह दूसरा लड़का आ गया दुल्हन सामने देख ही रही थी और माला पहुंच गई दूल्हे के बजाय उस के दोस्त के सिर के करीब वो तो दुल्हन की छोटी बहन तेज थी उस ने दुल्हन को तुरंत रोका नही तो रंग में बड़ा भयंकर भंग पड़ जाती और लेने  के देने पड़ जाते |
इसी प्रकार एक बार एक श्रन्द्धाजली  सभा थी जो पहले जमाने में घर के सब से बड़े लडके के सिर पर जिम्मेदारी का अहसास दिलाने के रूप में पगड़ी बाँधने की रीति  के रूप में थी पर अब यह रीति यानि रस्म तो गौण हो गई अपितु झूठ मूठ दिखावा करने के लिए शोक सभाओं का पर जोर दिया जाने लगा है जिस में कई ऐसे २ लोग बोलने आ जाते हैं जिन्होंने बेशक दिवंगत व्यक्ति को एक बार भी देखा नही होता है परन्तु श्रद्धांजली सभा को रौबदार बनाने के लिए नेताओं को बुलाने का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है ताकि वे कह सकें कि जब हमारा बाप मरा था तो कैसे २ बड़े २ नेता आये थे यानि मक्कार लोग इकठ्ठे हुए थे जिन में सफेद पोश चोर डकैत सभी थे | ऐसी ही एक शोक  सभा में एक नेता जी जैसे ही दिवंगत व्यक्ति के चित्र पर फूल  चढ़ने लगे वैसे ही फोटो ग्राफर ने नेता जी को कहा  सामने देखो| नेता जी सामने देख कर चित्र पर फूल चढ़ने लगे पर सामने देखने के चक्कर में उन के फूल चित्र पर  गिरने के बजाय चित्र के नजदीक बैठे व्यक्ति पर गिर गये | पर को कहि सके बड़ेन को लखि बड़ेन की भूल |
यहाँ भी यही हुआ नेता जी को तो कौन क्या कह सकता था | पर जिस पर गिरे  उस  ने जैसे तैसे अपने उपर से वे फूल तो झाड  लिए  पर पस उस के मन में एक वहम बैठ गया कि ये शोक के फूल थे जो उस के उपर गिर गये थे इन से कहीं  कोई अनहोनी न हो जाये | बेचारा परेशान हो गया और आप को पता ही है कि  मन की परेशानी  के कारण  ही बहुत  सी परेशानियाँ बिना बात भी आनी शुरू  हो जाती हैं |इस के कारण  ही उसे  अपने अंदर कुछ बीमारी महसूस होनी लगी उस ने इन्हें दूर करने के लिए बहुत  से टोने टोटके करवाए जो जिस ने कहा  उस ने इन्हें दूर करने का वैसा ही बेवकूफी भरा कम किया परन्तु उन से होना तो कुछ नही था एक दिन अनायास उस की मुझ से भेंट हो गई | उस ने मुझे भी अपना दुखड़ा सुनाया मुझे भी चिंता हुई कि अच्छा भाल आदमी था जो फोटो ग्राफर के सामने दिखने के चक्कर में  बिना वजह वहम हो जाने से परेशान हो गया है | क्यों कि उस पर फोटो ग्राफर और नेता जी का सीधा असर हो रहा थ डाइरेक्ट एक्शन |
मैंने मन ही मन सोचा कि इस के वहम का इलाज होना बड़ा जरूरी है यदि इलाज नही हुआ तो इसे जरूर कुछ हो जायेगा | मैंने उसे काहा  कि मैं तुम्हे एक बहुत ही बढिया सस्ता और आजमाया हुआ इलाज बता सकता हूँ |उस ने बड़ी कृतज्ञता भाव से तुरंत बताने का आग्रह किया तब मैंने उसे बताया कि किसी तरह  तुम उन्ही नेता जी का एक फोटो यानि चित्र ले आओ और उस के सामने गूगल की  नही गुलाब की अगर बत्ती जलाना और उस के चित्र के सामने देसी घी या तेल का नही अपितु रिफाइंड तेल का दीपक जलाना और उस के बाद वैसे ही फूल जैसे तुम्हारे उपर गिरे थे ऐसे ही ले लेना उन्हें ला कर नेता जी चित्र के सामने एक पैर पर खड़े हो कर उन के चित्र पर चढ़ा देना उस इस  में भी कुछ शंका थी कि वह इस से ठीक हो जायेगा क्या ?तब मैंने उसे बताया कि यदि भ्रष्ट नेताओं के चित्रों पर फूल  चढ़ जाये तो तुम क्या पूरा देश और देश की सारी व्यवस्था ही ठीक हो जाये |
इसी बीच मेरे मित्र भाई भरोसे लाल के छोटे लडके की शादी टी हो गई सब इंतजाम पूरे हो गये और फोटो ग्राफर तो अपना मौहल्ले वाला है ही पुरानी जान पहचान का , उसे भी बता दिया गया शादी की रीती रिवाज शुरू हो गये बरात  वापिस भी आ गई | फोटो ग्राफर ने सामने दिखा २ कर खूब चित्र खींचे | पर हमारे यहाँ तो बरात  के लौटने के बाद भी कई तरह के रीती रिवाज होते हैं जो कई दिन  बाद तक  भी चलते रहते हैं इसी प्रकार के एक नेग यानि रीती में वर वधू मन्दिर गये वहाँ पूजा हुई पूजा के बाद जैसे ही लड़का माँ के पैर छूने  को झुका फोटो ग्राफर ने कहा  सामने देखो और वह सामने देख कर माँ के पैर छूने  लगा माँ  के पास ही उस की नई नवेली वधू भी खड़ी थी | अब वह तो सामने देख रहा था और सामने देख कर पैर छोने के चक्कर में उस के हाथ माँ के पैरो पर जाने के बजाय  बहू के पैरों तक पहुंच गये और फोटो ग्राफर ने क्लिक कर दिया क्यों कि उस का चहेरा तो पूरा दिखाई ही दे रहा था बात तो मुंह दिखने की  या चेहरा  दिखने की है पैर छूने  की थोड़ी है |
अब क्या  था फोटो खींच ही चुका था और और उसे हटाना फोटो ग्राफर  का नुकसान था सो वह अपना नुकसान क्यों करता इस लिए चुप चाप एल्बम में भी लगा दिया जब एल  बम बन कर घर आई तो सब को अपने २ चहरे देखने की जल्दी थी ही सब लोग इकठ्ठे हो गया एक २ फोटो को सब ध्यान से देख रहे थे पर एक फोटो को देख कर सब हैरान हो गये एक ने पूछ भी लिया कि आप के यहाँ यह कौन सी रित है जिस में लड़का बहू के पैर छूता  है यह देख कर सब हैरान  हो गये क्यों कि भारत क्या भारत के बाहर भी पूरे विश्व में कोई देश ऐसा नही होगा जहाँ लड़का अपनी घरवाली के पैर छूता  हो या ऐसा रिवाज हो परन्तु वैसे भी पैर छूने की  रीत तो केवल भारत में ही है या भारत वंशी जहाँ २ गये वहाँ २ भी अभी जीवित है | पर वहाँ २ भी घरवाली के पैर कोई नही छूता |
तब सब ने पुछा तो फिर यह फोटो में क्या हो रहा है सब ने देखा लडके के हाथ बहू के पैरों के पास हैं  और माँ पास खड़ी है | लडके ने तुंरत फोटो निकल कर फाड़ना चाहा पर सब ने कहा  कि फोटो फाड़ना तो बड़ा अपशकुन होता है अब खींच गया है कोई बात नही तेरी ही तो घरवाली है क्या हो गया तू  माता जी के पैर ही तो छु रहा था यह तो फोटो ग्राफर के सामने देखने के चक्कर में बहू माता के पैरों को गलती से हाथ लग गया और यह तो सारी उम्र तेरे और तेरे घर वालों के पैर छूती रहेगी तूने  एक बार छू लिए तो कौन सी आफत हो गई |
परन्तु पैर तो पैर ही हैं वे छूने  के लिए ही तो होते हैं और पैर छूने की परम्परा  तो यहाँ बहुत पुरानी है हमारे यहाँ सुबह उठते ही सब से पहला काम पैर छूने का होता था इसी लिए भगवान श्री राम जी तक बड़ों के पैर छूते थे संत सूरदास जी ने भी इसी लिए यह पड़ गया होगा " चरण कमल बंदौ हरी राई" तो यहाँ भी सब से सुकोमल कमल जैसे चरण नव वधू यानि नई नवेली दुल्हन के ही तो थे तो फिर उस के छू लिए तो क्या हो गया यह तो भक्ति की बात है |परन्तु चलो यहाँ तो अपनी ही घरवाली  वाली थीपरन्तु यदि सामने देखने के चक्कर में हाथ कहीं और को छू जाता या लग जाता तो क्या होता बताने की जरूरत नही है |
इसी लिए किसी और के कहने में आ कर या बहकावे में आकर कभी कोई ऐसा काम करना जो अनसमझ  फोटो ग्राफर जैसे लोग करवा देते हैं और हम अपना चेहरा  दिखने के चक्कर में कुछ भी कर देते हैं या हम दूसरों के बहकावे में आकर या दूसरों के कहने से गलत लोगों को चुन कर गलत लोगों की सरकार बनवा देते हैं और फिर पांच साल तक पछताते रहते है इस लिए किसी के बहकावे में आने के बजाय खुद जिधर मर्जी आये देखना फिर परखना और तब कोई काम  करना फिर देखना कितना मजा आएगा और सब कुछ ठीक भी हो जायेगा |