Thursday, September 8, 2011

ये सर्जना के क्षण तुम्ही को तो समर्पित हैं |

तुम्हीं को तो समर्पित हैं |
ये सर्जन के क्षण

नींद आँखों में लिए
पलकें न होती बंद
चित्र कितने आ रहे हैं
सामने क्रम बद्ध
चित्र भी हूँ तूलिका भी
मैं सर्जक भी हूँ

इस सर्जन के ही लिए
सब कुछ समर्पित है ||

मलय सी शीतल पवन
जो छो रही तन और मन
ये छुअन की चेतना
करती है हर्षित मन
हर्ष के क्षण मिले कितने
बहुत ही तो कम

ये सुखद से अल्प क्षण
तुम को समर्पित हैं

एक संदेशा जो आया
अर्थ गहरे हैं
उसी गहरे अर्थ के
अनुवाद कितने हैं
जो तुम्ही समझे
न कोई दूसरा समझा

लाख कोशिश रही
कुछ तो कहूँ तुम को
शब्द ही पर अर्थ को
पहचानते कब हैं
शब्द को पहचन लें
वे अर्थ कितने हैं

अर्थ जिन को मिल गये
वे शब्द अर्पित हैं ||

4 comments:

Anju (Anu) Chaudhary said...

ईश्वर को समझने वाला ...अगर उसे समझ जाये तो वो खुद ईश्वर हो जाये.....

बहुत अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्दों का यह अर्घ्य महत है।

vandan gupta said...

लाख कोशिश रही
कुछ तो कहूँ तुम को
शब्द ही पर अर्थ को
पहचानते कब हैं
शब्द को पहचन लें
वे अर्थ कितने हैं

अर्थ जिन को मिल गये
वे शब्द अर्पित हैं ||

behad gahan arthon se saji bhavavyakti..........vo shabd nahi jinke arth hon aur jinke arth hain wo hi samarpit.......adbhut ..........dil me uatar gaye ye shabd.

संजय भास्‍कर said...

हरेक पंक्ति बहुत मर्मस्पर्शी है। कविता अच्छी लगी ।

संजय भास्कर
आदत....मुस्कुराने की
पर आपका स्वागत है
http://sanjaybhaskar.blogspot.com