Saturday, November 14, 2009

तुम्हारा मौन



तुम्हारा मौन
कितना कोलाहल भरा था
लगा था कहींबादलों कि गर्जन के साथ
बिजली न तडक उठे
तुम्हारे मौन का गर्जन
शायद समुद्र के रौरव से भी
अधिक भयंकर रहा होगा
और उस में निरंतर
उठी होंगी उत्ताल तरंगें
तुम्हारे मौन में
उठते ही रहे होंगे
भयंकर भूकम्प
जिन से हिल गया होगा
पृथ्वी से भी बडा तुम्हारा ह्रदय
इसी लिए मैं कहता हूँ
कि तुम अपना मौन तोड़ दो
और बह जाने दो
अपने प्रेम कि अजस्र धरा
भागीरथी सी शीतल
दुग्ध सी धवल
ज्योत्स्ना सी स्निग्ध
और अमृत सी अनुपम

4 comments:

सुधाकल्प said...

डा . वेद जी
नमस्कार
आपका ब्लॉग देखकर बहुत अच्छा लगा I बधाई है !'तुम्हारा मौन 'कविता पढ़कर अहसास हुआ कि मौन कितना मुखर होता है लेकिन कवि की उससे भी ज्यादा कल्पना -अभिव्यंजना प्रशंसनीय है !
सुधा भार्गव

vedvyathit said...
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vedvyathit said...
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Monika Jain "मिष्ठी" said...

bhut sundar..maun vyakti bahar se maun dikhayi deta hai par bheetar kitne tufaan umadte rahte hai ye bas vahi jaanta hai.